उत्तरकाशी/टिहरी,। चंद्रप्रकाश बहुगुणा
देश को आजाद हुए 80 वर्ष और उत्तराखंड राज्य बने 26 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन टिहरी जिले के प्रतापनगर विधानसभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत सिलोडा, पट्टी उपली रामोली के ग्रामीण आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीणों को गांव तक पहुंचने के लिए करीब 5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ रहा है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर राज्य आंदोलनकारी देवी सिंह पंवार ने गांव की तस्वीरें और वीडियो साझा कर सरकार और जनप्रतिनिधियों से इस स्थिति पर सवाल उठाए हैं। देवी सिंह पंवार के मुताबिक, वर्ष 2005 में तत्कालीन विधायक स्वर्गीय फूल सिंह बिष्ट ने उनके अनुरोध पर खमाखाल-सिलोडा 7 किलोमीटर मोटर मार्ग को स्वीकृति दिलाई थी। इसके बाद करीब दो दशक से अधिक समय गुजर गया। इस दौरान कई विधायक और सरकारें बदलीं, लेकिन सिलोडा गांव तक सड़क पहुंचाने का सपना अब तक पूरा नहीं हो सका।
पंवार का कहना है कि सड़क निर्माण के लिए उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर लगातार प्रयास किए। जनता दरबार में ग्रामीणों की समस्या उठाई गई और मुख्यमंत्री को भी ज्ञापन दिया गया। इसके बावजूद गांव की सड़क समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सका। उनका कहना है कि जिन लोगों के हाथों में नीति और निर्णय लेने की जिम्मेदारी है, उनसे लगातार उम्मीद की गई, लेकिन ग्रामीणों की समस्या पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि स्थिति यह है कि आज जनप्रतिनिधियों को भी गांव तक पहुंचने के लिए पैदल जाना पड़ रहा है। ग्रामीणों को मतदान का अधिकार तो प्राप्त है, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अधिकार अब भी अधूरा है। पंवार ने इसे विकास के दावों पर गंभीर सवाल बताया।
राज्य आंदोलनकारी ने अपने बयान में तत्कालीन जिलाधिकारी सुंदरलाल मुयाल का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि उनके प्रयासों से गांव को नांगणी स्थान पर खेल मैदान की सुविधा मिली थी। उन्होंने टीएचडीसी के तत्कालीन जीएम डीपीएस त्यागी का भी जिक्र किया और बताया कि उन्हें गांव स्थित सिद्धपीठ मां नांगणी के दर्शन कराए गए थे। देवी सिंह पंवार ने पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, शासन-प्रशासन और लोक निर्माण विभाग से सिलोडा गांव की समस्या को गंभीरता से लेने की अपील की है। उनका कहना है कि राज्य आंदोलन से जुड़े व्यक्ति के तौर पर उन्हें यह देखकर पीड़ा होती है कि राज्य बनने के वर्षों बाद भी ग्रामीणों को सड़क के लिए पैदल चलना पड़ रहा है।
सिलोडा गांव की यह स्थिति केवल एक गांव की सड़क समस्या नहीं, बल्कि पहाड़ी और सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर जारी चुनौतियों की ओर भी ध्यान खींचती है। उत्तराखंड में सड़क और कनेक्टिविटी को विकास की अहम कड़ी माना जाता है। ऐसे में ग्रामीणों का लंबे समय से सड़क की मांग करना सरकार और संबंधित विभागों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि स्वीकृत योजनाओं को जमीन पर पूरा करने में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है। अब ग्रामीणों की नजर शासन-प्रशासन और लोक निर्माण विभाग की ओर है। सवाल यही है कि खमाखाल-सिलोडा मोटर मार्ग की वर्षों पुरानी मांग कब पूरी होगी और सिलोडा के ग्रामीणों को 5 किलोमीटर पैदल चलने की मजबूरी से कब राहत मिलेगी।






