Thursday, December 9, 2021
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विजय दशहरा पर विशेष: कन्नौज के सम्राट आयुष्चन्द्र ने करवाया था अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर का पुनर्निर्माण ! 

देश के बहुत कम लोगों को ही पता होगा कि इत्र और इतिहास की नगरी कन्नौज के गहरवार वंशीय सम्राट आयुष्चन्द्र ने अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था ! यह बात भी देश के बहुत कम लोगों को ही मालूम होगी कि भगवान राम के पुत्र महाराज कुश द्वारा पिता की कीर्ति को चिरस्थायी बनाने के लिए निर्मित करवाये गए इस मंदिर को सबसे पहले यवन आक्रांता मिनेण्डर ने आक्रमण करके ध्वस्त किया था। लेकिन तीन माह के अंदर ही शुंग वंश के प्रतापी राजा द्युमत्सेन ने युद्ध के दौरान मिनेण्डर को न सिर्फ मौत के घाट उतारा था, बल्कि उसकी राजधानी कौशाम्बी पर अधिकार भी कर लिया था। किन्तु यवन आक्रांता द्वारा ध्वस्त किये गए मंदिर का उस समय पुनर्निर्माण नहीं हो सका था।
      यूपी के जनपद सोनभद्र निवासी युवा इतिहासकार डॉ जिंतेंद्र कुमार सिंह ‘संजय’ द्वारा लिखी गई पुस्तक “श्रीराम की अयोध्या” जिसे उ.प्र. हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा पुरुस्कृत भी किया गया है, उसमें उल्लेखित तथ्यों के अनुसार स्कंद पुराण में जिस स्थान का वर्णन राम के जन्म स्थल का है, उस स्थल पर रामकोट नाम से महाराज कुश द्वारा बनवाये गए मंदिर को कालांतर में न सिर्फ हूणों ने ध्वस्त किया बल्कि शनै-शनै वह मंदिर जीर्ण-शीर्ण भी होता रहा । इस लिए लम्बे समय तक मंदिर के खण्डहरों में ही गर्भगृह के स्थान पर पूजा होती रही । भारतीयों की असीम आस्था के प्रतीक इस मंदिर का प्रथम पुनर्निर्माण उज्जैयिनी के सम्राट शकारि विक्रमादित्य ने 57 वर्ष ईसा पूर्व करवाया था। हालांकि इतिहाकर ठाकुर सरनाम सिंह सूर्यवंशी, नरेंद सहगल एवम ब्रजगोपाल रॉय ‘चंचल’ ने जिस शुंग वंशीय नरेश को द्युमत्सेन कहा है, वस्तुतः वह शुंग वंश का संस्थापक पुष्पमित्र शुंग ( 1218- 1158 ई.पू. ) है। महर्षि पतंजलि के समकालीन शुंगवंशीय नरेश सेनापति पुष्पमित्र ने अयोध्या में दो बार अश्वमेघ यज्ञ किया था। जिसका उल्लेख अयोध्या के तत्कालीन राज्यपाल श्री धनदेव के अभिलेख से होता है। पुष्पमित्र के अश्वमेघ यज्ञ में स्वयं महाभाष्यकार महर्षि पतंजलि ने पुरोहित की भूमिका का निर्वहन किया था। इसका उल्लेख महर्षि पतंजलि ने महाभाष्य के “पुष्पमित्रो यजते, याजका याजयन्ति’ इह पुष्पमित्र याजयामः” प्रभृति सूत्रों में किया है । इस तरह यह भी कहा जा सकता है कि रामकोट मंदिर का पुनर्निर्माण विक्रमादित्य से साढ़े ग्यारह सौ साल पहले भी पुष्यमित्र शुंग ने करवाया था । खैर जो भी हो और रामकोट मंदिर का पुनर्निर्माण भी चाहे जितनी बार किया गया हो ? किन्तु कन्नौज के गहरवार सम्राट आयुष्चन्द्र ने श्रीराम जन्म स्थल पर रामकोट नाम से बने मंदिर का जीर्णोद्धार कराते हुए उसे “विष्णुहरि मंदिर” के रूप में भव्यता प्रदान की थी। कन्नौज के गहरवार सम्राट चन्द्रदेव ( 1085-1100 ई ) के चन्द्रावती अभिलेख में वर्णित है कि सम्राट चन्द्रदेव ने अयोध्या में सरयू तट पर स्थित स्वर्गद्वार घाट पर स्नान, चतुर्बाहु भगवान वासुदेव का पूजन एवम पिता का पिंडदान करने के बाद भूमिदान किया था। जिसके बाद सम्राट चन्द्रदेव ने विष्णुहरि की दिव्य प्रतिमा को मणिजटित स्वर्णा भरणों से अलंकृत भी किया था। जिस समय सम्राट चन्द्रदेव ने सरयू के स्वर्गद्वार पर घाट पर स्नानादि किया था उस समय अयोध्या उनके प्रत्यक्ष शासन में थी ।
       इतिहासकार विन्सेंट आर्थर स्मिथ ( 1848-1920 ई. ) ने सम्राट चन्द्रदेव के राज्य का विस्तार काशी और अयोध्या तक माना है। इसकी पुष्टि महाराज जयचंद ( 1170-1194 ई ) के 1186 ई के फैजाबाद ताम्रपत्र से होती है । कन्नौज के सम्राट चन्द्रदेव के पौत्र सम्राट गोविंदचंद्र ( 1110-1156 ई ) के शासनकाल में साकेतमण्डलपति के पद को अलंकृत करने वाले सम्राट आयुष्चन्द्र के श्रीराम जन्मभूमि स्थल से प्राप्त अयोध्या- प्रस्त्राभिलेख में “विष्णुहरि-मंदिर” का विस्तार पूर्वक वर्णन है। इस तरह देखा जाए तो कन्नौज के गहरवार राजाओं ने ‘विष्णुहरि मंदिर’ के रुप में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का जिस भव्यता से पुनर्निर्माण करवाया था वो सर्वथा अद्वितीय था। यह बात अलग है कि आठवीं शताब्दी के प्रथम चरण में हिन्दू आस्था के इस कीर्तिस्तम्भ का पुनर्निर्माण कन्नौज के अप्रतिम सम्राट यशोवर्मन ( 725-752 ई.) ने भी करवाया था। सम्राट यशोवर्मन के दरबारी महाकवि वाक्पतिराज ने प्राकृत भाषा में रचित ‘गौडवहो’ काव्य में अयोध्या ( हरिश्चन्द्र नगरी ) में सम्राट यशोवर्मन द्वारा निर्मित श्री रामजन्म भूमि मंदिर का वर्णन किया है। सुप्रसिद्ध साहित्येतिहासकार प्रो. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने पुस्तक सँस्कृति विश्वकोश भाग-1 में लिखा है कि महाराज दशरथ के शासनकाल के रामकोट की जो भौगोलिक स्थिति थी। उसी के अनुसार महाराज विक्रमादित्य ने 57 वर्ष ईसा पूर्व में रामकोट का पुनर्निर्माण कराया था। जबकि इस भू-भाग का पुनरुद्धार गहरवार सम्राट चन्द्रदेव ने भी करवाया है। रुद्रयामल में लिखा है कि राजसभा की पश्चिमी दिशा में रामदुर्ग है। राजद्वार पर हनुमान हैं। दक्षिण में नल नील का किला है। पास में ही सुग्रीव और अंगद के दुर्ग हैं। इसकी पुष्टि उच्च न्यायालय द्वारा भी की जा चुकी है। यही नहीं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट में 235 फोटोग्राफ शामिल किए गए जिनसे यह सिद्ध किया गया कि जन्मभूमि का यह मंदिर दशवीं शताब्दी का है ।
       यह बात भी बहुत कम लोगों को ही पता होगी कि मुगल वंश के प्रथम शासक ज़हीरुदीन मुहहमद बाबर ने मुस्लिम फकीर फ़जल अब्बास कलन्दर की बददुआ से बचने और उसके आग्रह को मानते हुए 1528 ई में सेनापति मीरबाक़ी से राम जन्मभूमि पर बने ‘विष्णुहरि मंदिर’ को ध्वस्त करवाकर मस्जिद बनवाई थी। हिंदुओं की ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीयों की आस्था का प्रतीक राम जन्मभूमि स्थल पर मस्जिद बनने के बाद 203 वर्ष तक के मुगल शासनकाल में 64 बार संघर्ष हुआ और लाखों राम भक्तों ने जान गंवाई थी। नबाबी काल 1731 से 1856 के सवा सौ वर्षों में 10 बार और ब्रिटिश काल के 90 वर्षों में 2 बार तथा स्वतंत्र भारत 1947 से 1992 के 45 वर्षों में 5 बार सहित कुल 81 बार संघर्ष हुआ है। जिसमें देश के असंख्य लोगों की जानें गईं हैं। जिस समय बाबर के सेनापति मीरबाँकी द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ध्वस्त करने के साथ ही  मंदिर के पुजारियों की हत्या करते हुए वहां पर मस्जिद बनाने की घोषणा की गई। उस समय अयोध्या से 30 मील दक्षिण में स्थित भीटी राज्य के महाराज महताब सिंह जो बद्रीनारायण की तीर्थयात्रा पर निकले हुए थे।उन्होंने अपनी तीर्थयात्रा स्थगित करते हुए एक लाख चौहत्तर हजार रामभक्तों को लेकर बाबर की साढ़े चार लाख सेना पर चढ़ाई की थी। राम जन्म भूमि के लिए पौने दो लाख रामभक्तों का 17 दिन तक युद्ध चला था। शरीर में जान और खून की एक बूंद रहने तक राम जन्म भूमि के लिये युद्ध करने की कसम खाकर मैदान में उतरे सभी राम भक्त युद्ध में मारे गए थे। इस भीषण कत्लेआम के बाद मुगल सेनापति मीरबाँकी ने तोपों के गोलों से राम जन्म भूमि मंदिर को तहस-नहस कर दिया था। राम जन्म भूमि मंदिर के मसाले से ही मस्जिद की नीब में लखोरी ईंटों के साथ पानी की जगह मरे हुए हिंदुओं का रक्त इस्तेमाल किया गया। किन्तु अब अयोध्या में उसी स्थल पर पुनः मंदिर का भव्य र्निर्माण हो रहा है तो वो सभी लोग और स्थल चर्चा में आ गए हैं जो किसी न किसी रूप से उस स्थल से जुड़े रहे हैं जिसमें पौराणिक नगर कन्नौज का नाम अग्रणी है ।
विजया दशहरा आज, जानिए महत्व व पूजन !
भारत में ही नहीं बल्कि पूरे संसार के सनातनधर्मी दशहरा पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक मानते हैं । हिंदू पंचांग के अनुसार दिवाली से ठीक 20 दिन पहले आश्विन मास शुक्लपक्ष की दशमी तिथि को दशहरा मनाया जाता है । दशहरे का दिन साल के सबसे पवित्र दिनों में से एक माना जाता है । इस दिन किसी भी नए काम की शुरुआत के लिए ये दिन सर्वोत्तम माना जाता है । दशहरा का त्योहार इस साल 15 अक्टूबर शुक्रवार को मनाया जाएगा । धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त असुर राज  महिषासुर का वध करके उस पर विजय प्राप्त की थी। जबकि भगवान श्रीराम ने इसी तिथि को रावण का वध किया था। इसी लिए यह पर्व असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है और इस पर्व को ‘विजयादशमी’ के नाम से जाना जाता है । आज 15 अक्टूबर को विजया दशमी के दिन शुक्रवार दोपहर 2 बजकर 1 मिनट से 2 बजकर 47 मिनट तक विजय मुहूर्त है । इस मुहूर्त की कुल अवधि 46 मिनट ही है । जबकि दोपहर के समय पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 1 बजकर 15 मिनट से लेकर दोपहर 3 बजकर 33 मिनट तक रहेगा । इस दिन भगवान श्रीराम, दुर्गा जी, लक्ष्मी जी, सरस्वती जी, गणेश जी और हनुमान जी की आराधना करके सभी के लिए मंगल कामना की जाती है । समस्त मनो कामनाओं की पूर्ति के लिए विजया दशमी पर रामायण पाठ, श्रीराम रक्षा स्त्रोत, सुंदरकांड आदि का पाठ किया जाना शुभ माना जाता है ।
लेखक: दिनेश दुबे 
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