
जन एक्सप्रेस उत्तरकाशी: उत्तरकाशी के धराली गांव में मल्टी हजार्ड अर्ली वार्निंग सायरन सिस्टम समय पर स्थापित किया गया होता, तो हाल की आपदा से हुई तबाही को काफी हद तक रोका जा सकता था। वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्तपोषित इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत राज्यभर में 250 संवेदनशील स्थानों पर यह प्रणाली स्थापित की जानी थी, लेकिन अब तक केवल 175 स्थानों तक ही यह पहुंच पाई है।
उत्तरकाशी जैसे अति संवेदनशील ज़िले में 14 जगहों पर यह सिस्टम लगाया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश धराली गांव उसमें शामिल नहीं था। यही कारण रहा कि 5 अगस्त को जब प्रकृति ने कहर बरपाया, तब धराली के लोगों के पास समय रहते सतर्क होने का कोई साधन नहीं था।
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी कि सिस्टम को तीन स्तरों से नियंत्रित किया जाता है — स्थानीय, जिला और राज्य स्तर से। सिस्टम को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि वह बाढ़, भूस्खलन, भूकंप, अतिवृष्टि, हिमस्खलन जैसी आपदाओं की स्थिति में अलग-अलग ध्वनियों के जरिए चेतावनी देता है।
यह प्रणाली केरल में पहले से सफलतापूर्वक काम कर रही है, लेकिन उत्तराखंड में इसकी गति धीमी रही है। धराली और हर्षिल जैसी संवेदनशील जगहों पर इसकी अनुपस्थिति सवाल खड़े करती है।
धराली में तबाही और सायरन की चूक
धराली की निवासी ममता पंवार बताती हैं कि अगर अलर्ट समय पर मिला होता तो ग्रामीण समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंच सकते थे। “पिछले साल हमारी फसलें समय पर मंडी पहुंच गई थीं, लेकिन इस बार रास्ते बंद हैं और हम पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुके हैं,” उन्होंने बताया।
सड़कें बंद, फसलें खेतों में सड़ने की कगार पर
हर्षिल घाटी में गंगोत्री हाईवे सोनगाड़, डबराणी, हर्षिल, और झाला में कई स्थानों पर बाधित है। इस वजह से सुक्की, जसपुर, पुराली, धराली, बगोरी, मुखबा जैसे गांवों के काश्तकारों की नगदी फसलें – फूलगोभी, ब्रोकली, बंदगोभी, कद्दू – खेतों में सड़ रही हैं। मंडी तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं बचा है।
जिलों में अब तक कहां-कहां लगे हैं सिस्टम:
ज़िला सिस्टम की संख्या
उत्तरकाशी 14
टिहरी गढ़वाल 14
देहरादून 15
पौड़ी गढ़वाल 15
हरिद्वार 08
चमोली 14
रुद्रप्रयाग 09
अल्मोड़ा 11
बागेश्वर 09
चम्पावत 10
नैनीताल 09
पिथौरागढ़ 14
ऊधमसिंह नगर 08
अन्य (DM/SSP कार्यालय सहित) 25
अब सवाल यह है: क्या बाकी संवेदनशील क्षेत्रों में सिस्टम लगाने का काम समय पर पूरा होगा, या फिर अगली आपदा में कोई और धराली बन जाएगा?






