
जन एक्सप्रेस उत्तरकाशी : उत्तराखंड के टिहरी जनपद की पहाड़ियों में स्थित सेम मुखेम नागराज मंदिर को उत्तर द्वारिका के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर पौराणिक महत्व और आस्था का केंद्र है, जहां लाखों श्रद्धालु कालसर्प दोष और पितृदोष से मुक्ति पाने के लिए दर्शन करते हैं। इस मंदिर की मान्यता द्वापर युग से जुड़ी हुई है, जहाँ कृष्ण ने नागराज के रूप में अवतार लिया था।
पौराणिक मान्यता: नागराज रूप में कृष्ण
मान्यता है कि जब द्वारिका डूबी, तो कृष्ण टिहरी जनपद में स्थित मुखेम गाँव आए और यहाँ नागराज के रूप में प्रकट हुए। कालिया नाग के उद्धार के बाद कृष्ण ने उसे यहाँ दर्शन देने का वचन दिया था और यहीं उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर नागराज रूप में स्थापित हुए।
गंगू रमोला का श्राप और पत्थर की गायें
एक रोचक कथा के अनुसार, कृष्ण ने गंगू रमोला से स्थान माँगा लेकिन अस्वीकार करने पर उन्हें श्राप दे दिया, जिससे उनकी गायें पत्थर की बन गईं। आज भी मंदिर के आसपास इन पत्थर की आकृतियों को देखा जा सकता है, जो उस कथा की पुष्टि करती हैं।
कालसर्प दोष और पितृ दोष से मुक्ति का स्थान
यह मंदिर विशेष रूप से कालसर्प दोष निवारण के लिए प्रसिद्ध है। दूर-दराज़ से श्रद्धालु यहाँ आकर विशेष पूजा करते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। गर्भगृह में स्थित स्वयंभू नाग शिला को द्वापर युग की माना जाता है।
उत्तर द्वारिका की मान्यता
सेम मुखेम को उत्तर द्वारिका कहा जाता है क्योंकि यहाँ नागराज के रूप में कृष्ण की स्थायी उपस्थिति मानी जाती है। गढ़वाल राजाओं द्वारा 1300 ईस्वी में स्थापित इस मंदिर में टिहरी नरेशों द्वारा पूजा की परंपरा आज भी जारी है।
13वीं शताब्दी से जारी पूजा परंपरा
मंदिर की पूजा परंपरा सेमवाल परिवार के पास है। आज भी तीन घरानों द्वारा बारी-बारी से नियमित पूजा की जाती है। टिहरी नरेशों ने मंदिर के लिए ताम्रपत्र भी प्रदान किए थे, जो इस धरोहर के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।
रहस्य से भरा “जादुई पत्थर”
डुगडुगी धार में स्थित एक अनोखा पत्थर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है, जिसे ज़ोर से हिलाने पर नहीं हिलता लेकिन हल्के स्पर्श से हिल जाता है। यह गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांतों पर आधारित बताया जाता है।
स्वयंसेवी प्रयासों से मंदिर विकास
रामायण प्रचार समिति के ऋषि राम उनियाल के नेतृत्व में मंदिर परिसर का विकास कार्य बिना सरकारी सहायता के किया गया। स्थानीय जनता और श्रद्धालुओं के सहयोग से मुख्य द्वार और अन्य निर्माण कार्य संपन्न हुए हैं।
वार्षिक मेला: आस्था का महाकुंभ
प्रत्येक वर्ष 26–27 नवंबर को विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दौरान ढोल-नगाड़ों, अखंड भजन संध्याओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
सरकारी उपेक्षा और स्थानीय अपेक्षाएँ
पूर्व जिला पंचायत सदस्य देवी सिंह पंवार बताते हैं कि मंदिर मार्ग आज भी दुर्गम है, बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाएँ नहीं हैं। धर्मशाला जैसी व्यवस्थाओं की सख्त जरूरत है। उनका मानना है कि यदि सरकार इसे “पाँचवाँ धाम” घोषित करे, तो क्षेत्र का तीव्र विकास संभव है।
संरक्षण से विकास और रोज़गार दोनों
उत्तरकाशी मंदिर जीर्णोद्धार समिति के अध्यक्ष अजय प्रकाश बड़ोला कहते हैं कि इस धरोहर का संरक्षण युवाओं के लिए रोजगार का साधन बन सकता है। प्रचार-प्रसार और पर्यटन योजनाएँ पलायन को रोक सकती हैं।
देश-विदेश से श्रद्धालु, श्रद्धा की गूंज
स्वामी सूर्य नारायण गिरी महाराज बताते हैं कि रवाई घाटी और पौड़ी क्षेत्र के अलावा अब देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ आकर पूजा करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक अनुभव
मंदिर का प्राकृतिक वातावरण, भव्य मूर्तियाँ, विशाल घंटा और शांत वातावरण हर श्रद्धालु को आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। मुख्य द्वार पर स्थित नागराज की प्रतिमा और उसके ऊपर कृष्ण की प्रतिमा इस धाम को विशिष्ट बनाती है।
कैसे पहुँचे सेम मुखेम?
हरिद्वार और देहरादून से लम्बगांव तक बस या टैक्सी द्वारा पहुँचा जा सकता है। वहाँ से लगभग 5 किलोमीटर की पैदल यात्रा के बाद मंदिर तक पहुँचा जाता है। यह मार्ग कठिन ज़रूर है, परंतु प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण अत्यंत रमणीय है।
पाँचवाँ धाम: आस्था, परंपरा और विकास की आशा
सेम मुखेम धाम को पौराणिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से “पाँचवाँ धाम” कहना अतिशयोक्ति नहीं। यह स्थल न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि क्षेत्रीय विकास, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण की भी आधारशिला बन सकता है।






