व्यवसायी बोला चित्रकूट में इलाज नहीं, क्या यहां सिर्फ मरने के लिए हैं लोग?
चित्रकूट में स्वास्थ्य सेवाएं ढकोसला, न कार्डियोलॉजिस्ट, न न्यूरोलॉजिस्ट – विकास की बात बेमानी

जन एक्सप्रेस, चित्रकूट।(हेमनारायण हेमू)जब इंसान की मां बीमार हो और उसे इलाज के लिए 300 किलोमीटर दूर ले जाना पड़े — तो समझिए वो शहर जी नहीं रहा, बस सांस ले रहा है।यह शब्द हैं चित्रकूट के एक व्यवसायी प्रिंस के, जो इन दिनों अपनी मां की बीमारी और जिले की बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर बुरी तरह टूट चुके हैं।व्यवसायी प्रिंस ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर जिले के सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि चित्रकूट में न तो एक ढंग का डॉक्टर है, न अस्पताल में इलाज की सुविधा। अगर कोई गंभीर मरीज हो जाए, तो उसे लखनऊ, कानपुर या नागपुर भेजना पड़ता है। जब सरकार कहती है कि हर गांव तक इलाज पहुंच गया है, तो क्या चित्रकूट यूपी का हिस्सा नहीं है?”
नेताओं पर सीधा हमला — “नेता खुद सरकारी अस्पताल में इलाज क्यों नहीं कराते?
प्रिंस ने योगी सरकार और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक के दावों पर भी उंगली उठाई। उन्होंने हाल ही का उदाहरण देते हुए कहा कि मंत्री ओमप्रकाश राजभर की तबीयत बिगड़ी तो उन्हें सरकारी नहीं, मेदांता भेजा गया।
“जब खुद मंत्री सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं करते, तो आम जनता से क्या उम्मीद की जा रही है?”
मेरे पिताजी वेंटिलेटर पर थे, 50 लाख खर्च किए – लेकिन अब भी डर है
प्रिंस ने अपनी निजी व्यथा भी साझा की। मेरे पिता मेदांता हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर पड़े रहे। लाखों रुपये खर्च करने के बाद जब वापस लौटा तो सवाल सामने खड़ा था – अगर आज फिर कुछ हो गया, तो क्या करूं? कहां जाऊं?उनकी मां नागपुर से इलाज करवा रही हैं, लेकिन कुछ दिन पहले भयंकर दर्द उठने पर भी चित्रकूट में उन्हें एक भी भरोसेमंद डॉक्टर या अस्पताल नजर नहीं आया। गाड़ी स्टार्ट थी, ड्राइवर बैठा था, मां कराह रही थी – लेकिन मेरा दिल कांप गया… किस अस्पताल जाऊं?”
मैं धरने पर बैठूंगा – व्यवसायी की चेतावनी
अपनी पीड़ा से आक्रोशित प्रिंस ने एलान किया है कि अगर हालात ऐसे ही रहे, तो वह अपना व्यापार बंद कर धरने पर बैठेंगे।
“मैं टैक्स देता हूं, रोजगार देता हूं – लेकिन जब घर में बीमार पड़े तो सरकार कहां है? अधिकारी कहां हैं? नेताओं की आंखें कब खुलेंगी?”
चित्रकूट में सिस्टम ICU पर – इलाज के लिए तरसती जनता
चित्रकूट जिले की सच्चाई को उजागर करता यह मामला केवल एक व्यवसायी की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक तमाचा है।
जहां कार्डियोलॉजिस्ट नहीं, न्यूरोलॉजिस्ट नहीं, एमर्जेंसी सेवा नहीं — वहां विकास की बात करना केवल भाषणबाज़ी है। क्या अब सरकार इस आवाज़ को सुनेगी? या फिर एक और ज़िला मौत के हवाले होता रहेगा?






