वन विभाग का बुलडोज़र… दलितों के सपनों पर चला!
तीन पीढ़ियों से रह रहे दलित परिवारों के घरों पर चला सरकारी बुलडोज़र, मासूम बच्चों संग खुले आसमान तले आए लोग — वन विभाग ने दी सफाई, कहा “जगह हमारी नहीं थी

जन एक्सप्रेस चित्रकूट:चित्रकूट ज़िले के ग्राम गढ़चपा के मजरा पहरतरा पुरवा में गुरुवार को एक ऐसा मंजर देखने को मिला जिसने पूरे इलाके को हिला दिया।तीन–तीन पीढ़ियों से उसी मिट्टी में पले-बढ़े दलित परिवारों के घर वन विभाग की टीम ने बुलडोज़र से गिरा दिए। बारिश में गिरे मकानों की दीवारें दोबारा खड़ी की जा रही थीं, लेकिन अचानक आई वन विभाग की टीम ने पूरे परिवार की उम्मीदें मलबे में बदल दीं।
“हम अपराधी नहीं, गरीब हैं…” — ग्रामीणों की चीखें
ग्रामवासी हरि, रामलाल, राम खेलावन, बिहारी लाल, खेतईया जैसे दर्जनों दलित परिवारों ने बताया साहब, हमारा घर बारिश में गिर गया था, फिर से बना रहे थे।गांव के कुछ लोगों ने झूठी शिकायत कर दी।दरोगा जी आए, और बुलडोज़र चलवा दिया। अब बच्चे खुले आसमान में हैं।”रोते-बिलखते ग्रामीणों का कहना है कि वे तीन पीढ़ियों से इसी जगह रह रहे हैं, लेकिन बिना किसी नोटिस या जांच के घर ढहा दिए गए।ग्रामीणों के आरोप हैं कि कुछ स्थानीय रसूखदारों ने “वन भूमि” बताकर झूठी शिकायत दी और उसी के दबाव में कार्रवाई की गई।हालांकि बाद में वन विभाग के दरोगा रामऔतार ने खुद स्वीकार किया कि कार्रवाई गलती से हुई। दरोगा रामऔतार ने कहा जहां मकान बने हैं, वो हमारी रेंज की जमीन नहीं है। हमसे गलती हुई, किसी के कहने पर चले गए थे। अब हमें कोई आपत्ति नहीं है वो ग्राम पंचायत की जमीन है। जिन घरों को वन भूमि बताकर ढहाया गया, वो वन विभाग की ज़मीन निकली ही नहीं!भाजपा कार्यकर्ता व ग्राम प्रधान प्रतिनिधि अरुण सिंह बघेल ने इस कार्रवाई को “ग़ैरकानूनी और अमानवीय” बताया। उन्होंने कहा ये दलित परिवार सैकड़ों सालों से यहां रह रहे हैं। जांच के बिना कार्रवाई करना गलत है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग है कि पीड़ितों को न्याय मिले और ज़िम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई हो।”जिला पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधानों और ग्रामीणों ने भी साफ कहा कि यह जमीन ग्राम पंचायत की है, यहां दो पीढ़ियों से लोग रह रहे हैं, किसी ने अवैध कब्ज़ा नहीं किया।ये गरीब अपने पुराने मकानों की टूटी दीवारें बना रहे थे प्रशासन की खामोशी पर उठ रहे सवाल बिना जांच के बुलडोज़र चलाने का आदेश किसने दिया? जब वन विभाग खुद कह रहा है कि “जगह हमारी नहीं थी”, तो कार्रवाई किस आधार पर हुई? क्या गरीब और दलित होना अब गुनाह बन गया है?






