ब्राह्मण जनप्रतिनिधियों के सहभोज पर सख्ती
सर्द मौसम में बढ़ा सियासी पारा
जन एक्सप्रेस, लखनऊ।
हिंदी फिल्म का यह गीत आज यूपी की सियासत में ठीक बैठता है हम करें तो रास लीला, वे करें तो रामलीला!जी हां उत्तर प्रदेश की सर्द लहर के बीच सियासत का तापमान तेजी से चढ़ गया है। अलग अलग समाजों के जनप्रतिनिधियों की बैठकों और सहभोज के बहाने राजनीति गरमा गई है। आरोप यह कि जहां कुछ समाजों की बैठकों पर संगठन ने चुप्पी साधे रखी, वहीं ब्राह्मण जनप्रतिनिधियों के सहभोज के मामले में कड़ी कार्रवाई और नोटिसों की बौछार ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी। मामला इतना आगे बढ़ा कि इसकी गूंज लखनऊ से दिल्ली तक सुनाई देने लगी और भाजपा का प्रदेश नेतृत्व सक्रिय हो गया।
सहभोज बना सियासी तूफान
ब्राह्मण जनप्रतिनिधियों के सहभोज पर चली नोटिस की गाज ने सियासी तूफान खड़ा कर दिया है। संबंधित नेताओं से स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद बेचैनी साफ दिखने लगी है। अंदरखाने चर्चाएं तेज हैं कि कुछ जनप्रतिनिधियों ने नाराजगी भी जताई है। एक विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर तीखे शब्दों में कहा कि “पार्टी में ब्राह्मण नेता नहीं, दास बना दिए गए हैं।” हालांकि इस बयान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, पर राजनीति में नए ताप का कारण जरूर बन गया।
अतीत के दिग्गजों का हवाला, वर्तमान पर सवाल
पार्टी के भीतर यह सवाल उठ रहा है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसी शख्सियतों की परंपरा वाले दल में आज ब्राह्मण नेतृत्व हाशिये पर क्यों दिख रहा है?
क्या यह महज संयोग है, या फिर बदलते राजनीतिक समीकरणों का परिणाम? यही सवाल विवाद को और संवेदनशील बना रहा है।
प्रदेश अध्यक्ष का सख्त रुख
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने इस पूरे प्रकरण पर दो-टूक रुख अपनाते हुए साफ कहा कि जाति या समूह आधारित गतिविधियां पार्टी के संविधान के विरुद्ध हैं। जनप्रतिनिधियों को सख्त चेतावनी दी गई है कि भविष्य में ऐसा दोहराव अनुशासनहीनता माना जाएगा। उनका कहना है कि ऐसे आयोजन समाज में गलत संदेश देते हैं और पार्टी परिवार या जाति विशेष के आधार पर नहीं, बल्कि सिद्धांत और विचारधारा के आधार पर राजनीति करती है।
विकास बनाम जाति की राजनीति
प्रदेश अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकासमुखी राजनीति आगे बढ़ रही है। उनके अनुसार विपक्ष की जाति-आधारित राजनीति हाशिये पर जा रही है, जबकि सपा, बसपा और कांग्रेस बदलते परिदृश्य में कमजोर पड़ती दिख रही हैं। भाजपा सर्वस्पर्शी सामाजिक न्याय और विकास के एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।
नोटिस की गूंज और बढ़ती हलचल
सहभोज विवाद से जुड़े नोटिसों की गूंज अभी थमी नहीं है। माना जा रहा है कि यह प्रकरण पार्टी के भीतर तीन मोर्चों पर चुनौती बनकर उभरा है
जातीय समीकरण
संगठनात्मक अनुशासन
नेतृत्व की सख्ती
आगे क्या?
सर्द हवाओं के बीच सियासत का पारा लगातार चढ़ रहा है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह मामला यहीं ठंडा पड़ेगा या फिर किसी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का संकेत बनेगा। फिलहाल इतना तय है कि “जाति बनाम विकास” की बहस एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में है और आने वाले दिनों में इसका असर राजनीतिक रणनीतियों पर साफ दिख सकता है।
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