उत्तराखंडहरिद्वार

तपोभूमि से गायत्री तीर्थ तक के प्रगति कदम वैचारिक क्रांति का केंद्र बना ‘शांतिकुंज’

जन एक्सप्रेस/हरिद्वार।चंद्रप्रकाश बहुगुणा:गायत्री की अविरल धारा, हिमालय की शांत गोद और तपस्वी ऋषियों की चेतना से अनुप्राणित शांतिकुंज आज केवल एक आध्यात्मिक संस्थान ही नहीं, बल्कि मानवता के नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का वैश्विक केंद्र बन चुका है। करोड़ों लोगों की आस्था, जीवन-दृष्टि और चरित्र-निर्माण की यात्रा यहीं से दिशा पाती है। किंतु इस ‘गायत्री तीर्थ’ के विराट स्वरूप के पीछे युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की दशकों की कठोर तपस्या, दूरदर्शी चिंतन और मानव-कल्याण का असाधारण संकल्प निहित है।
शांतिकुंज की स्थापना किसी भौतिक वैभव के लिए नहीं वरन् समाज के भीतर चेतना का नवोदय करने के लिए हुई। उप्र के मथुरा में वर्षों तक चली अखंड साधना के उपरांत युगऋषि पं श्रीराम शर्मा आचार्यश्री को उनके दिव्य मार्गदर्शक सत्ता से यह स्पष्ट निर्देश मिला कि भविष्य में एक ऐसे केंद्रीय स्थल की आवश्यकता होगी, जहाँ से युग निर्माण की योजनाएँ संचालित होंगी। इसी दिव्य प्रेरणा के परिणामस्वरूप वर्ष 1971 में हरिद्वार की पावन भूमि पर शांतिकुंज का बीजारोपण हुआ।यह कोई संयोग नहीं कि शांतिकुंज उसी तपोभूमि पर स्थित है, जहाँ प्राचीन काल में ऋषि विश्वामित्र ने साधना कर मानवता को दिशा दी थी। पूज्य आचार्यश्री ने इसी ऊर्जावान भूमि को चुना, ताकि यहाँ आने वाला प्रत्येक साधक अपने भीतर सुप्त दिव्यता को जाग्रत कर सके। आरंभ एक छोटी-सी कुटिया से हुआ, जहाँ वंदनीया माता भगवती देवी शर्मा अनेकानेक साधकों की सेवा एक माँ के वात्सल्य से करती थीं। यही स्थान आज वटवृक्ष बनकर विश्व को छाया दे रही है।शांतिकुंज का प्राणतत्व है यहाँ प्रज्वलित अखंड दीप, जिसकी स्थापना पूज्य आचार्यश्री ने वर्ष 1926 में की थी। मथुरा से हरिद्वार आगमन के समय इस दीप-ज्योति को विशेष श्रद्धा के साथ लाया गया। यह दीप केवल लौ नहीं, बल्कि पूज्य गुरुदेव के सौ वर्षों के संकल्प, तप और आत्मबल की सजीव प्रतीक है। इसी अखंड ऊर्जा से प्रेरित होकर युग निर्माण योजना, देवसंस्कृति विश्वविद्यालय और विश्वव्यापी गायत्री चेतना का विस्तार संभव हुआ।आज शांतिकुंज द्वारा संचालित हो रहे योजनाएं लगभग सौ देशों में सक्रिय है। इन दिनों हम जैसे-जैसे 2026 के जन्मशताब्दी वर्ष की ओर कदम बढ़ रहे हैं, शांतिकुंज का महत्व और भी अधिक मुखर होता जा रहा है। यह तपोभूमि आज भी उसी संदेश को प्रतिध्वनित कर रही है, जो शांतिकंुज संस्थापकद्वय ने मानवता को दिया था।

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