
जिला संवाददाता – नरेंद्र रावत
जन एक्सप्रेस / पौड़ी: पहाड़ों की खूबसूरती और पौड़ी की पहचान माने जाने वाले घने देवदार-बांज के जंगल अब सड़क चौड़ीकरण की जद में आने की आशंका से खतरे में हैं। बुआखाल से टेका तक सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के नाम पर हजारों की संख्या में देवदार, बांज, बुरांश, काफल समेत मिश्रित प्रजातियों के पेड़ों के कटान की तैयारी का आरोप लगाते हुए स्थानीय युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है।
आंदोलनकारियों का कहना है कि जिस सड़क को चौड़ा करने के लिए पेड़ों पर कटान के निशान लगाए गए हैं, उस मार्ग पर यातायात का दबाव अपेक्षाकृत कम है और यह मुख्य मार्ग के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल होता है। ऐसे में इतने बड़े पैमाने पर जंगल काटने की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि स्थानीय लोगों को विश्वास में लिए बिना और पर्यावरणीय प्रभावों का समुचित अध्ययन किए बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
घायल पेड़ों पर बांधे रक्षा सूत्र
मामले को लेकर पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर आवाज उठ रही थी। इसी क्रम में 18 अगस्त को स्थानीय युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नागदेवता रेंज क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया। पेड़ों पर कटान के निशान देखकर लोगों ने विरोध दर्ज कराया। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए कटान के निशान वाले पेड़ों पर रक्षा सूत्र बांधे गए और उन्हें बचाने का संकल्प लिया गया।
इसके बाद जिला वनाधिकारी, पौड़ी को ज्ञापन सौंपकर पेड़ों के कटान पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई। ज्ञापन में बिना आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया के लगाए गए कटान निशानों की जांच कर जिम्मेदारी तय करने तथा संभावित पारिस्थितिक नुकसान का विस्तृत आकलन कर रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
पौड़ी के ‘लंग्स’ पर आरी चली तो जलस्रोतों पर पड़ेगा असर
स्थानीय लोगों का कहना है कि नागदेवता क्षेत्र का जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पौड़ी की प्राकृतिक जीवनरेखा है। करीब 80 से 90 प्रतिशत क्षेत्र में घने वन हैं। यहां सैकड़ों वर्ष पुराने पेड़ों से लेकर नई पौध तक मौजूद है। कंडोलिया की ओर से नागदेवता तक लगभग तीन किलोमीटर की पट्टी में घना देवदार वन है, जहां से अनेक जलस्रोत निकलते हैं। इसके आगे बांज, बुरांश और काफल के समृद्ध जंगल हैं।
लोगों के अनुसार यही वन क्षेत्र पौड़ी के जलस्रोतों को बनाए रखने, तापमान को नियंत्रित करने और शहर को प्राकृतिक रूप से ठंडा व सुहावना रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बड़े पैमाने पर पेड़ों के कटान से जलस्रोतों, जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
भूस्खलन का खतरा बढ़ने की भी आशंका
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चेताया कि पहाड़ी ढलानों से वनावरण हटने पर मिट्टी की पकड़ कमजोर हो सकती है। इससे भविष्य में भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ सकता है। उनका कहना है कि विकास परियोजनाओं के लिए जंगलों की बलि देने के बजाय ऐसे विकल्प तलाशे जाने चाहिए, जिनसे सड़क सुविधा भी बेहतर हो और पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान पहुंचे।
जवाब नहीं मिला तो आंदोलन की चेतावनी
ज्ञापन के माध्यम से वन विभाग और संबंधित अधिकारियों से सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता, प्रस्ताव, स्वीकृतियों और पर्यावरणीय प्रक्रिया से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब मांगा गया है। स्थानीय लोगों ने चेतावनी दी है कि यदि पेड़ों के कटान पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई और उनकी आपत्तियों का संतोषजनक समाधान नहीं हुआ तो विरोध को आंदोलन का रूप दिया जाएगा।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन विकास की कीमत पौड़ी के जंगल, जलस्रोत और आने वाली पीढ़ियां नहीं चुका सकतीं। उनका स्पष्ट संदेश है—“विकास के नाम पर हिमालय के विनाश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।”






