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​विकास के नाम पर कब तक छले जाएंगे पहाड़: बदहाल सड़कों के बीच दम तोड़ती उम्मीदें.

जन एक्सप्रेस /पिथौरागढ़ :- ​इक्कीसवीं सदी के भारत में जब ‘डिजिटल क्रांति’ और ‘विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे’ की गूंज हर मंच से सुनाई देती है, तब उत्तराखंड के सुदूर पर्वतीय अंचल एक कड़वी और त्रासद हकीकत बयान कर रहे हैं। राज्य के सैकड़ों गांव आज वीरान होकर ‘भूतिया गांव’ (घोस्ट विलेज) की फेहरिस्त में दर्ज हो चुके हैं। पलायन के पीछे रोजगार या बेहतर शिक्षा की तलाश तो है ही, लेकिन सबसे बड़ा नासूर बुनियादी सुविधाओं—विशेषकर सड़क—का घोर अभाव है।

​पिथौरागढ़ जिले की तहसील बेरीनाग का शुक्लयाडी–खेती–धारी संपर्क मार्ग इस प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक संवेदनहीनता का जीता-जागता प्रमाण है। पांच वर्ष पूर्व उम्मीद की एक लकीर खींचते हुए इस सड़क की कटिंग का कार्य शुरू किया गया था। ग्रामीणों ने अपनी उपजाऊ ज़मीनें इस विश्वास के साथ दे दी थीं कि आने वाली पीढ़ियों की राह सुगम होगी। मगर आधा दशक बीत जाने के बाद भी यह सड़क आज तक पक्की नहीं हो सकी। हरे-भरे खेतों के सीने पर आज सड़क नहीं, बल्कि जानलेवा गड्ढे, दलदल, बरसाती तलैया और भूस्खलन का मलबा फैला है।

​तकरीबन पांच हजार की आबादी को मुख्यधारा से जोड़ने वाला यह मार्ग आज विकास नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का स्मारक बन चुका है। बरसात के दिनों में यह रास्ता पूरी तरह मौत का फंदा बन जाता है। सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि किसी बीमार बुजुर्ग, अचानक हादसे के शिकार व्यक्ति या प्रसव पीड़ा से तड़पती गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए आज भी लोग डोली या कंधों के सहारे मीलों पैदल चलने को मजबूर हैं। समय पर इलाज न मिलने से कई सांसें रास्ते में ही थम जाती हैं। क्या आज़ाद भारत के नागरिक सिर्फ इसलिए असमय काल के गाल में समाने को विवश हैं क्योंकि वे पहाड़ों में बसते हैं?

​ग्रामीणों की हताशा का आलम यह है कि चौपालों पर अब विकास की चर्चा नहीं, गहरी मायूसी तैरती है। बुजुर्ग भारी मन से कहते हैं—”लगता है हमारे जीते-जी यह सड़क कभी पूरी नहीं होगी।” स्थानीय प्रशासन की चौखट से लेकर जन प्रतिनिधियों के दरवाजों तक अनगिनत ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं, पर नतीजा हमेशा ‘सिफर’ रहा। हद तो तब हो जाती है जब केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय तक अपनी गुहार पहुंचाने की कोशिशें भी नौकरशाही और प्रोटोकॉल की दीवारों से टकराकर दम तोड़ देती हैं।

​नेताओं और हुक्मरानों के लिए पहाड़ का जनजीवन शायद केवल चुनाव के समय ही प्रासंगिक होता है। चुनाव आते ही घोषणाओं और वादों की झड़ी लग जाती है, और नतीजे आते ही जनता को उसके भाग्य पर छोड़ दिया जाता है। पर हुक्मरानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि धैर्य की भी एक सीमा होती है। अब गांव के जुझारू युवा और जागरूक नागरिक लामबंद हो रहे हैं। उपेक्षा और छल के खिलाफ यह सुलगता आक्रोश आगामी चुनावों में अपनी लोकतांत्रिक ताकत दिखाने को तैयार है।

​सरकार और शासन को यह साफ समझना होगा कि पलायन रोकने के लिए नीतियां फाइलों में नहीं, जमीन पर उतरनी चाहिए। यदि शुक्लयाडी–खेती–धारी मार्ग का निर्माण अविलंब पूरा कर इसे सुचारू नहीं किया गया, तो यह केवल एक सड़क का अधूरा रहना नहीं होगा, बल्कि लोकतंत्र में आम नागरिक के भरोसे की अंतिम सांस होगी। पहाड़ अब सिर्फ वादे नहीं, पक्की डामर और जवाबदेही मांगता है।

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