आजादी का जश्न उधर, बरदहा नदी के किनारे जिंदगी इधर! ऑपरेशन के बाद मासूम को लेकर बाढ़ में फंसे मां-बाप

जन एक्सप्रेस /चित्रकूट :- देश आजादी का पर्व मना रहा है, लेकिन चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में बरदहा नदी के किनारे बसे ग्रामीणों के लिए आज भी रास्ते की आजादी अधूरी है। मानिकपुर तहसील क्षेत्र के चमरौहा में बहुप्रतीक्षित पुल का निर्माण न होने से बारिश के दिनों में करीब एक दर्जन गांवों के हजारों ग्रामीणों की जिंदगी नदी के जलस्तर की मोहताज हो जाती है।
शुक्रवार रात से लगातार हुई बारिश के बाद बरदहा नदी उफान पर है। रपटे के ऊपर पानी बहने से आवागमन ठप है। ऐसे में चमरौहा, पयासी पुरवा, मऊ गुरदरी, रानीपुर समेत आसपास के गांवों के लोग नदी के दोनों ओर फंसे हुए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि हर साल बारिश में यही हाल होता है, लेकिन स्थायी समाधान के नाम पर सिर्फ आश्वासन ही मिलते हैं।
ऑपरेशन के बाद मासूम को लेकर नदी किनारे फंसे मां-बाप
इस बार सामने आया एक वीडियो व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रहा है। बताया जा रहा है कि एक बच्चे का ऑपरेशन हुआ है और डॉक्टर ने उसे घर ले जाने की सलाह दी, लेकिन बरदहा नदी के उफान ने परिवार का रास्ता रोक दिया। बच्चा सीमेंट की बेंच पर लेटा दिखाई दे रहा है और उसके उपचार से संबंधित पाइप भी लगी हुई है। मां-बाप नदी का पानी कम होने का इंतजार करने को मजबूर हैं।परिजन की पीड़ा शब्दों में साफ झलकती है—“बच्चे का ऑपरेशन हुआ है, डॉक्टर ने घर भेज दिया, लेकिन नदी के पानी की वजह से घर नहीं जा पा रहे हैं। अब कब पानी कम होगा और कब बच्चे को घर ले जाकर उसकी दवा-इलाज जारी करा पाएंगे, यही सबसे बड़ी चिंता है।”
यह तस्वीर सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उस पूरे इलाके की मजबूरी का आईना है, जहां बरसात आते ही जिंदगी ठहर जाती है।
‘क्या यही आजादी है?’—ग्रामीणों का सिस्टम से सीधा सवाल
एक तरफ देश स्वतंत्रता दिवस की खुशियां मना रहा है, वहीं दूसरी तरफ गंभीर बीमारी से जूझ रहे मासूम को लेकर मां-बाप नदी के किनारे रास्ता खुलने का इंतजार कर रहे हैं। ग्रामीणों का सवाल है कि अगर आज भी इलाज करा चुके मरीज को घर पहुंचने के लिए नदी का पानी उतरने का इंतजार करना पड़े, तो आखिर विकास और बुनियादी सुविधाओं की आजादी किसके लिए है?
ग्रामीणों का कहना है कि बरदहा नदी पर पुल सिर्फ सड़क संपर्क का मामला नहीं है। यह स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और हजारों लोगों की जिंदगी की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। बारिश के तीन महीने गांव मानो टापू बन जाते हैं और किसी आपात स्थिति में अस्पताल पहुंचना भी चुनौती बन जाता है।
ग्रामीणों की दो टूक—योजनाएं बाद में, पहले पुल बनाइए
ग्रामीणों की मांग अब किसी बड़ी सुविधा की नहीं है। उनकी दो टूक है—“सरकार हमारा पुल बना दे, भले सरकारी योजनाओं का लाभ न दे।”सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो ने भी बरदहा नदी की इस समस्या को एक बार फिर सामने ला दिया है। अब देखना यह है कि वायरल वीडियो और ग्रामीणों की दर्दनाक तस्वीरें जिम्मेदार प्रशासन की नींद खोल पाती हैं या फिर पानी उतरने के साथ ही यह मुद्दा भी कागजों और फाइलों में दबकर रह जाएगा।






