
जन एक्सप्रेस, उत्तरकाशी। राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय उत्तरकाशी में छात्रों द्वारा शुरू किया गया आमरण अनशन अब अपने चौथे दिन में पहुँच चुका है। छात्रों ने यह आंदोलन कॉलेज में फैकल्टी की कमी, परीक्षा परिणामों में देरी, प्रवेश प्रक्रिया में अनियमितता और मूलभूत सुविधाओं के अभाव को लेकर शुरू किया है।आंदोलन का नेतृत्व कर रहे छात्र नेता आशीष कोहली, आलोक रावत और बृजेश कुमार ने बताया कि जब तक उनकी माँगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका धरना जारी रहेगा।
छात्र नेताओं को मिला व्यापक समर्थन
आज अनशन स्थल पर कई पूर्व और वर्तमान छात्र नेताओं ने पहुँचकर आंदोलन को अपना समर्थन दिया।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे:
अमरीकन पुरी, ॐ छात्र संगठन संस्थापक ,पृथ्वीपाल, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष एवं वर्तमान क्षेत्र पंचायत सदस्य,आकाश भट्ट, छात्र नेता ,योगेश डंगवाल, पूर्व छात्र नेता एवं वर्तमान ज्येष्ठ प्रमुख ,गौतम रावत, अध्यक्ष महासंघ,दीपक भट्ट, छात्र नेता,सौरव राणा, पूर्व छात्र इन सभी ने एक स्वर में छात्रों की माँगों को जायज़ ठहराते हुए प्रशासन से त्वरित समाधान की अपील की।
पुलिस हस्तक्षेप पर विरोध, प्रशासन से वार्ता
छात्र नेताओं ने बीती रात अनशन स्थल पर पुलिस प्रशासन की कथित बर्बरता की आलोचना की और इसकी पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए कॉलेज प्रशासन से वार्ता की। छात्रों ने माँग की कि अनशन शांतिपूर्ण है और इसमें किसी भी प्रकार की दमनात्मक कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
माँगें: फैकल्टी नियुक्ति से लेकर बुनियादी सुधार तक
छात्रों की प्रमुख माँगों में शामिल हैं:
विश्वविद्यालय व शासन स्तर पर लंबित समस्याओं का शीघ्र समाधान
महाविद्यालय में रिक्त फैकल्टी पदों की त्वरित नियुक्ति
परीक्षा परिणाम में पारदर्शिता और समयबद्धता
प्रवेश प्रक्रिया को सरल व निष्पक्ष बनाना
महाविद्यालय परिसर में मूलभूत सुविधाओं की बहाली और विस्तार
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
हालांकि महाविद्यालय प्रशासन की ओर से कुछ अधिकारी धरना स्थल पर पहुँचे और शांतिपूर्ण वार्ता की, लेकिन अब तक कोई ठोस लिखित आश्वासन नहीं दिया गया है। छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि माँगें जल्द पूरी नहीं की गईं तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा।
निष्कर्ष: छात्रों की आवाज़ बुलंद, समाधान की दरकार
छात्रों का यह आंदोलन न केवल उनकी समस्याओं का प्रतिबिंब है, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यवस्थागत सुधार की माँग भी है। यदि प्रशासन और शासन समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाते, तो यह मुद्दा व्यापक आंदोलन का रूप ले सकता है।






