
जन एक्सप्रेस / लखनऊ : अमीनाबाद जो लखनऊ का ऐतिहासिक और प्रमुख बाजार है, वहां की सबसे बड़ी समस्या—पार्किंग—पर आज तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका। त्योहारों के मौके पर यह समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। नतीजतन, दुकानदारों से लेकर ग्राहकों तक, सभी को भारी असुविधा झेलनी पड़ती है।
झंडेवाला पार्क: सुप्रीम कोर्ट की रोक बनी बाधा
करीब सात साल पहले अमीनाबाद की जमीनी हकीकत को देखते हुए तत्कालीन विकास मंत्री ने झंडेवाला पार्क में भूमिगत पार्किंग विस्तार का प्रस्ताव दिया था। मगर सुप्रीम कोर्ट के 1994-95 के आदेश के चलते यह योजना धरातल पर नहीं उतर सकी। आदेश के अनुसार, ऐतिहासिक झंडेवाला पार्क के स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती।
मोहन मार्केट पर विवाद बना रोड़ा
रानी लक्ष्मीबाई वार्ड के पार्षद शफीकुर्रहमान चचा ने जानकारी दी कि मोहन मार्केट को तोड़कर वहां अंडरग्राउंड पार्किंग बनाई जानी थी, लेकिन किरायेदारों के साथ कानूनी विवाद के कारण यह योजना भी अटक गई। खाली जमीन पर भी स्थानीय कब्जे और विवादों ने काम बिगाड़ दिया।
जनाना पार्क में फंसी 171 करोड़ की योजना
मौलवीगंज वार्ड के पार्षद मुकेश सिंह मोंटी के अनुसार, चार साल पहले जनाना पार्क पर मल्टीलेवल पार्किंग बनाने की योजना बनी थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के प्रयासों से 171 करोड़ रुपये का बजट भी पास हुआ, लेकिन पार्क की जमीन के स्वामित्व को लेकर विवाद खड़ा हो गया। अंततः बजट वापस चला गया और योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
घंटाघर पार्क के पास खुले पार्किंग की योजना
नगर निगम के जोनल अधिकारी ओम प्रकाश सिंह ने बताया कि घंटाघर पार्क के पास एक खुली पार्किंग विकसित की जानी है, जिसकी योजना अवस्थापना निधि के तहत पास हो चुकी है। इस पार्किंग में लगभग 500 दोपहिया वाहनों के खड़े होने की व्यवस्था होगी। हालांकि, चारपहिया वाहनों के लिए समाधान अब भी अधूरा है।
दुकानदारों की चिंता, ग्राहकों की बेबसी
त्योहारों में जब बाजार में रौनक बढ़ती है, तब यह समस्या और गंभीर हो जाती है। दुकानदारों का कहना है कि ग्राहक सिर्फ इसलिए लौट जाते हैं क्योंकि उन्हें वाहन खड़ा करने की जगह नहीं मिलती। इससे व्यापार पर सीधा असर पड़ता है।
नतीजा: योजनाएं बहुत, समाधान शून्य
साफ है कि अमीनाबाद की पार्किंग समस्या राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक समन्वय के अभाव में उलझी रही। जब तक जमीन के स्वामित्व और उपयोग को लेकर स्पष्टता नहीं होगी, तब तक अमीनाबाद सिर्फ ‘योजनाओं का बाजार’ ही बना रहेगा — समाधान का नहीं।






