उत्तराखंड

शिवनगरी उत्तरकाशी: नव संवत्सर और नवरात्र पर आस्था का सैलाब, मंदिरों के संरक्षण से सशक्त होगी आजीविका

जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी : आगामी 19 मार्च से प्रारंभ हो रहा हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्र शिवनगरी उत्तरकाशी के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पर्व है। हिमालय की गोद में और भागीरथी के तट पर बसी यह देवभूमि इन दिनों आध्यात्मिक आभा से सराबोर है। मंदिरों की घंटियों और भजनों की स्वर लहरियों के बीच उत्तरकाशी नव ऊर्जा के साथ नव संवत्सर के स्वागत के लिए तैयार है।

सिद्धपीठों में गूंजेंगे देवी के जयकारे

इस बार नवरात्रों के पावन अवसर पर उत्तरकाशी के सिद्धपीठों में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं:

  • सिद्धपीठ कुटेटी देवी मंदिर: यहाँ विश्व हिंदू परिषद के जिला धर्माचार्य प्रमुख गणेश महाराज द्वारा देवी भागवत कथा का आयोजन किया जाएगा।

  • विश्व शांति हेतु अनुष्ठान: पंडित ललित मोहन नौटियाल ने बताया कि मंदिर में विश्व शांति के लिए विशेष पूजा और सामूहिक कन्या पूजन संपन्न होगा।

  • प्रमुख शक्ति स्थल: शक्ति मंदिर, अष्टभुजा दुर्गा (पंजाब सिंध क्षेत्र), काली मंदिर (ज्ञानसू), नागणी देवी, महिषासुर मर्दिनी और रेणुका देवी मंदिर सहित अन्य प्राचीन मंदिरों में दुर्गासप्तशती पाठ और हवन की तैयारियां जोरों पर हैं।

आस्था और अर्थव्यवस्था का अटूट संगम

उत्तरकाशी मंदिर जीर्णोद्धार समिति के प्रदेश अध्यक्ष अजय प्रकाश बडोला ने महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए कहा कि उत्तरकाशी की धार्मिक चेतना यहाँ की अर्थव्यवस्था की आधारशिला भी है। नवरात्रों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ से:

  1. स्थानीय रोजगार: छोटे व्यापारियों, स्वयं सहायता समूहों और युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिलता है।

  2. कुटीर उद्योग: प्रसाद, फूल-माला और स्थानीय हस्तशिल्प की बिक्री से हजारों परिवारों की आजीविका जुड़ी है।

  3. आर्थिक सशक्तिकरण: मंदिरों का संरक्षण और सुदृढ़ीकरण सीधे तौर पर स्थानीय आर्थिक विकास को गति देता है।

विकास के लिए सुनियोजित योजना की आवश्यकता

लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि सरकार को धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। मंदिरों के सौंदर्यीकरण, स्वच्छता, सुगम आवागमन, पार्किंग और सुलभ शौचालयों की व्यवस्था उत्तरकाशी को ‘रोजगार सृजन का मॉडल’ बना सकती है।

सामूहिक संकल्प का समय

नववर्ष का यह शुभारंभ केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहे, बल्कि यह अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति (भागीरथी एवं हिमालय) के संरक्षण का भी संकल्प है। उत्तरकाशी के विभिन्न संगठन जैसे विहिप, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, राष्ट्रीय श्रीराम सेवा दल और ब्राह्मण समाज इस आध्यात्मिक गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए संकल्पित हैं।

इस अवसर पर पंडित भीमदेव शास्त्री थपलियाल, दुर्गेश नौटियाल, इन्दु शेखर नौटियाल, चन्द्र शेखर भट्ट, शिव प्रसाद भट्ट, अतुल भट्ट और अन्य गणमान्य व्यक्ति आयोजन को सफल बनाने में जुटे हैं।

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