बेसिक शिक्षा विभाग मैनपुरी बना भ्रष्टाचार का अड्डा, भ्रष्टाचारियों पर मेहरबान
मिडडे मील घोटाले से भी बड़े खेल की आशंका, उच्चस्तरीय जांच की उठी मांग

जन एक्सप्रेस/मैनपुरी : उत्तर प्रदेश का बेसिक शिक्षा विभाग मैनपुरी एक बार फिर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में है। विभाग में तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों पर संगठित तरीके से करोड़ों रुपये के घोटाले करने तथा शासन को गुमराह करने के आरोप लगाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच हो जाए, तो मिडडे मील घोटाले से भी बड़ा खेल उजागर हो सकता है।
आरोप है कि बेसिक शिक्षा अधिकारी दीपिका गुप्ता, बाबू अनुभव सिंह और विभाग के कुछ अन्य कर्मचारी मिलकर भ्रष्टाचार का संगठित नेटवर्क चला रहे हैं। फर्जी नियुक्तियों को संरक्षण देकर वेतन निकालना, अवैध अवकाश स्वीकृत करना, मृतक आश्रित के नाम पर फर्जी नियुक्तियां करना, स्पोर्ट्स किट वितरण में धांधली और पीएम-श्री विद्यालयों में वित्तीय अनियमितताओं जैसे गंभीर मामलों में विभागीय मिलीभगत की बातें सामने आ रही हैं।
बताया जा रहा है कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कई संदिग्ध नियुक्तियां जारी हैं और संबंधित लोगों को लगातार वेतन भुगतान किया जा रहा है, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंच रहा है। शिकायतों के बाद भी कार्रवाई के बजाय जांच रिपोर्टों को प्रभावित कर मामलों को दबाने का आरोप लगाया जा रहा है।
गौरतलब है कि करीब 15 वर्ष पूर्व मैनपुरी में मिड डे मील घोटाले ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। हाईकोर्ट के आदेश पर हुई सीबीआई जांच में कई बड़े अधिकारी, जिनमें तत्कालीन डीएम, सीडीओ, बीएसए और जिला समन्वयक तक शामिल थे, जेल भेजे गए थे। अब एक बार फिर उसी तरह के हालात बनने की बात कही जा रही है।
हाल ही में खेलकूद किट वितरण मामले में कुरावली ब्लॉक के कुछ विद्यालयों की जांच हुई थी, जिसमें भारी अनियमितताएं सामने आई थीं। जांच में बीएसए और बीईओ दोनों की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। महानिदेशक स्तर से कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए, लेकिन केवल बीईओ को निलंबित कर मामला शांत कर दिया गया। आरोप है कि प्रभावशाली लोगों की पैरवी और सेटिंग के चलते मुख्य जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई।
पीएम-श्री विद्यालयों में मॉडल इंफ्रास्ट्रक्चर, फर्नीचर और स्मार्ट क्लास सामग्री की खरीद में भी गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि एक संविदाकर्मी लेखाकार की पत्नी की फर्म को लाभ पहुंचाने के लिए सप्लाई कराई गई, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
शिकायत करने वालों का यह भी आरोप है कि उन्हें धमकियां दी जाती हैं और दबाव बनाकर चुप कराने की कोशिश होती है। कई लोगों को अपना गांव और घर तक छोड़ना पड़ा। अब स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन पूरे मामले की सीबीआई या उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।






