
जन एक्सप्रेस, देहरादून। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गांव में बादल फटने से मची तबाही ने एक बार फिर राज्य में अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक नियमों की अनदेखी को कठघरे में खड़ा कर दिया है। धराली का जो हिस्सा तबाह हुआ है, वह न सिर्फ क्षीर गंगा के बेहद करीब था, बल्कि वहाँ बड़े पैमाने पर होटल, होम स्टे और दुकानें बनी थीं। रिवर-व्यू और पर्यटन के नाम पर नदी के किनारे निर्माण कार्य ने इस विनाश को न्योता दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निर्माण कार्य मानकों के अनुसार नदियों से पर्याप्त दूरी बनाकर होते, तो जानमाल का इतना बड़ा नुकसान टाला जा सकता था।
रिवर-व्यू का लालच, नियमों की अनदेखी
राज्य में नदी, गाड़ और गदेरों के किनारे अवैध निर्माण की प्रवृत्ति अब आम हो गई है। रिवर व्यू के नाम पर होटल और होम स्टे खुलेआम बनाए जा रहे हैं, और स्थानीय प्रशासन की मशीनरी खामोश नजर आती है। निर्माण नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं और भूगर्भीय जोखिमों की अनदेखी की जाती है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: समय रहते चेतिए
भू-वैज्ञानिकों और आपदा विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड का अधिकतर हिस्सा भूकंपीय और भूस्खलन संभावित क्षेत्र में आता है। ऐसे में निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित और नियोजित करना निहायत जरूरी है। उनका कहना है कि:
राज्य स्तर पर एक मजबूत मास्टर प्लान बनाया जाए
संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण अनुमति की सख्त निगरानी हो
पर्यटन आधारित विकास प्रकृति के अनुकूल और टिकाऊ होना चाहिए
प्रकृति से तालमेल ही बचाव का रास्ता
धराली में जो विनाश हुआ, वह कहीं न कहीं एक मानवजनित आपदा भी है। प्रकृति के रौद्र रूप को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव से बचा जा सकता है—अगर हम प्रकृति से तालमेल बनाएं।नदियों से पर्याप्त दूरी, पहाड़ों पर भूगर्भीय परीक्षण के बाद ही निर्माण, और आपदा पूर्व तैयारी ही वो कदम हैं जो भविष्य में ऐसी त्रासदियों को टाल सकते हैं।
सबक लें, वरना समय नहीं देगा मौका
उत्तराखंड बार-बार चेतावनी देता रहा है—कभी केदारनाथ, कभी जोशीमठ, और अब धराली। सवाल सिर्फ सरकार या प्रशासन पर नहीं, बल्कि हर नागरिक, हर व्यवसायी और हर योजनाकार पर भी है।
क्या हम अब भी नहीं सुधरे, तो अगली त्रासदी सिर्फ समय का इंतज़ार होगी।






