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EWS सर्टिफिकेट के लिए गए युवक को बंधक बनाकर पीटा! लेखपाल और नायब तहसीलदार पर गंभीर आरोप।

5 हजार रुपये की कथित घूस न देने पर बेरहमी, ब्राह्मण समाज में उबाल—प्रशासनिक चुप्पी पर उठे सवाल?

जन एक्सप्रेस/बांदा उत्तर प्रदेश के बांदा जिले से भ्रष्टाचार और दबंगई का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। तहसील परिसर में EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) प्रमाण पत्र बनवाने गए एक ब्राह्मण युवक ने सरकारी तंत्र पर बंधक बनाकर बेरहमी से पीटने और घूस मांगने का गंभीर आरोप लगाया है। इस घटना के बाद से ब्राह्मण समाज में जबरदस्त आक्रोश है।

घूस से इनकार करने पर ‘तालिबानी’ सलूक

मामला देहात कोतवाली क्षेत्र के जमालपुर गांव का है। पीड़ित निपुण मिश्रा के अनुसार, वह अपना EWS प्रमाण पत्र बनवाने के लिए तहसील कार्यालय गया था। आरोप है कि वहां तैनात लेखपाल सुधीर यादव ने प्रमाण पत्र जारी करने के बदले 5000 रुपये की रिश्वत मांगी। जब निपुण ने आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए पैसे देने से मना किया, तो कर्मचारी आपा खो बैठे।

दौड़ा-दौड़ाकर पीटा, बाहरी गुंडों का लिया सहारा

पीड़ित का आरोप है कि लेखपाल सुधीर यादव और उनके करीब आधा दर्जन साथियों ने उसे कमरे में बंधक बना लिया। गंभीर आरोप यह भी है कि नायब तहसीलदार धनंजय पटेल की मौजूदगी और संलिप्तता में युवक के साथ मारपीट की गई। प्रत्यक्षदर्शी राहुल सिंह के मुताबिक:

  • युवक को जातिसूचक शब्द और “ब्राह्मण” होने का उलाहना देकर अपमानित किया गया।

  • कार्यालय के बाहर से लड़कों को बुलाकर युवक को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया।

प्रशासनिक चुप्पी और ब्राह्मण समाज का उबाल

घटना की सूचना मिलते ही ब्राह्मण सभा के पदाधिकारी और स्थानीय लोग पीड़ित के समर्थन में उतर आए हैं। समाज के लोगों का कहना है कि एक तरफ सरकार भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ तहसील के भीतर एक युवक की अस्मत और अधिकारों को कुचला जा रहा है।

सबसे अधिक सवाल सदर एसडीएम नमन मेहता की कार्यप्रणाली पर उठ रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने पीड़ित से मिलने तक से इनकार कर दिया। अभी तक किसी भी दोषी कर्मचारी के खिलाफ कोई ठोस दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है, जिससे प्रशासन की मंशा पर सवालिया निशान लग रहे हैं।

बड़ा सवाल: सेवा केंद्र या वसूली केंद्र?

यह घटना सिस्टम के उस चेहरे को उजागर करती है जहां आम आदमी अपने हक के कागजात के लिए भी सुरक्षित नहीं है।

“क्या सरकारी दफ्तर अब सेवा के बजाय वसूली और अत्याचार का अड्डा बन चुके हैं? अगर तहसील परिसर में ही नागरिक सुरक्षित नहीं है, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?”

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