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45 साल बाद अपने स्कूल लौटे अभयराज बिष्ट, गुरु का सम्मान कर स्कूल को बनाया योगशाला | अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026

जन एक्सप्रेस /उत्तरकाशी कुछ कहानियां सिर्फ खबर नहीं होतीं, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा बन जाती हैं। ऐसी ही एक मिसाल उत्तरकाशी के ऐतिहासिक प्राथमिक विद्यालय टकाना में देखने को मिली, जहां 45 साल पहले पांचवीं कक्षा पास करने वाले एडवोकेट अभयराज सिंह बिष्ट अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर अपनी पत्नी सुचिता बिष्ट के साथ लौटे।

वर्ष 1919 से पहले स्थापित इस ऐतिहासिक विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य केवल योग करना नहीं था, बल्कि अपने गुरु के प्रति सम्मान और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कारों से जोड़ना भी था।

गुरु का सम्मान, भावुक हुआ पूरा विद्यालय

कार्यक्रम की शुरुआत सुबह 7 बजे दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। पूर्व विधायक विजयपाल सिंह सजवाण की उपस्थिति में अभयराज बिष्ट ने ग्रामीणों, बच्चों और बुजुर्गों को योगाभ्यास कराया। गौ रक्षासन से लेकर शीर्षासन तथा भस्त्रिका, अनुलोम-विलोम और भ्रामरी जैसे प्राणायाम कराए गए।

योग सत्र के बाद अभयराज बिष्ट ने अपने एकमात्र जीवित गुरु साहब सिंह सेमवाल के चरण स्पर्श कर उन्हें शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। यह भावुक क्षण वहां मौजूद सभी लोगों के लिए यादगार बन गया।

योग के साथ हरियाली का संदेश

योग कार्यक्रम के बाद विद्यालय परिसर में फलदार पौधे, गिलोय और विभिन्न फूलों के पौधे लगाए गए। इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और हरियाली का संदेश दिया गया। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को फल और पेय वितरित किए गए तथा शांति पाठ के साथ आयोजन का समापन हुआ।

कार्यक्रम का संचालन सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता एवं अभयराज बिष्ट की बेटी अनीशा बिष्ट ने किया।

गांव के लोगों ने सराहा प्रयास

‘स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग’ थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में गांव के बुजुर्ग, महिलाएं, युवा और बच्चे बड़ी संख्या में शामिल हुए। ग्राम प्रधान ज्ञानेंद्र परमार और नीलम ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी जड़ों और गुरुजनों को याद रखता है, वही समाज को जोड़ने का काम करता है।

सफलता की असली पहचान

आज जब लोग सफलता के बाद अपनी शुरुआत को भूल जाते हैं, ऐसे समय में अभयराज बिष्ट ने अपने पहले विद्यालय लौटकर यह संदेश दिया कि सफलता की सबसे बड़ी डिग्री पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि गुरु का आशीर्वाद और अपनी जड़ों से जुड़ाव है। उनका यह प्रयास केवल योग दिवस का आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और पर्यावरण संरक्षण का जीवंत उदाहरण बन गया।

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