दोषियों की रिहाई के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 2 मई को अंतिम सुनवाई

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट बिलकिस बानो गैंगरेप केस के दोषियों की रिहाई के खिलाफ दायर याचिका पर 2 मई को अंतिम सुनवाई करेगा। आज गुजरात सरकार ने रिहाई से जुड़ी फाइल दिखाने के आदेश का विरोध किया। राज्य सरकार की दलील है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर ही गैंगरेप के दोषियों की रिहाई हुई है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि आज बिलकिस का तो कल किसी और का मामला हो सकता है, इसलिए आप दोषियों की रिहाई की वजह बताएं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे जघन्य मामलों में दोषियों की रिहाई समाज को प्रभावित करती है। इसलिए शक्तियों का इस्तेमाल जनहित में होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि चूंकि केंद्र सरकार का फैसला राज्य सरकार को मानना है, इसका मतलब ये नहीं कि राज्य सरकार अपना दिमाग नहीं लगाएगी।
27 मार्च को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि बिलकिस के साथ जो हुआ वह भयावह था। सुनवाई के दौरान दोषियों के वकील ने सुभाषिनी अली और महुआ मोइत्रा की याचिका का विरोध किया था।
दरअसल, 4 जनवरी को जस्टिस बेला त्रिवेदी ने इस मामले पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। 21 अक्टूबर, 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वुमन की ओर से दाखिल याचिका को मुख्य याचिका के साथ टैग करने का आदेश दिया था। याचिका में गुजरात सरकार के दोषियों की रिहाई के आदेश तत्काल रद्द करने की मांग की गई है।
17 अक्टूबर, 2022 को गुजरात सरकार ने हलफनामा दाखिल कर कहा था कि बिलकिस बानो गैंगरेप केस के दोषियों को उनकी सजा के 14 साल पूरे होने और उनके जेल में अच्छे व्यवहार की वजह से रिहा किया गया। हलफनामे में कहा गया है कि दोषियों की रिहाई केंद्र सरकार की अनुमति के बाद की गई। गुजरात सरकार ने कहा था कि दोषियों की रिहाई का फैसला कैदियों को रिहा करने के सुप्रीम कोर्ट के 9 जुलाई, 1992 के दिशा-निर्देश के आधार पर किया गया है न कि आजादी के अमृत महोत्सव की वजह से। गुजरात सरकार ने कहा कि बिलकिस बानो केस के दोषियों की समय से पहले रिहाई का एसपी, सीबीआई, सीबीआई के स्पेशल जज ने विरोध किया था।
24 सितंबर, 2022 को बिलकिस बानों गैंगरेप केस के दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया था। जवाब में कहा गया था कि गुजरात सरकार का उनकी रिहाई का फैसला कानूनी तौर पर ठीक है। उनकी रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता सुभाषिनी अली और महुआ मोइत्रा का केस से कोई संबंध नहीं है। आपराधिक केस में तीसरे पक्ष के दखल का कोई औचित्य नहीं बनता है। दोषियों के जवाब में कहा गया था कि उनकी रिहाई के खिलाफ न तो गुजरात सरकार ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और न ही पीड़ित ने। यहां तक कि इस मामले के शिकायतकर्ता ने भी कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाया है। ऐसे में कानून की स्थापित मान्यताओं का उल्लंघन होगा।
दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो के दोषियों की रिहाई से जुड़े मामले में दायर बिलकिस की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। बिलकिस बानो की पुनर्विचार याचिका में मांग की गई थी कि 13 मई 2022 के आदेश पर दोबारा विचार किया जाए।






