उत्तर प्रदेशचित्रकूट

डकैत का देवता! ददुआ की पुण्यतिथि पर भंडारा, क्या कानून ठप्प?

जिसने चित्रकूट को दहला दिया, आज उसी के नाम पर प्रसाद बंट रहा है!

जन एक्सप्रेस/चित्रकूट : पाठा क्षेत्र में कभी आतंक का पर्याय रहा दुर्दांत डकैत शिवकुमार उर्फ ददुआ एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार गोलियों के साए में नहीं, बल्कि भंडारे और पुण्यतिथि के आयोजन को लेकर। ग्राम पंचायत ऐलहा बढैया गांव के दतिया आश्रम में इस कुख्यात डकैत की पुण्यतिथि पर बड़े स्तर पर भंडारा आयोजित किया गया। सवाल यह है कि जिस व्यक्ति ने सैकड़ों लोगों की जान ली, वही अब ‘संत’ की तरह पूजा जा रहा है — और वह भी प्रशासन की नाक के नीचे!

पाठा में जिसकी दहशत से दिन में भी दरवाज़े बंद रहते थे, आज उसकी पूजा?
ददुआ का नाम सुनते ही बुंदेलखंड की धड़कनें तेज़ हो जाती थीं। जंगल में ‘राजा’ की तरह राज करने वाला यह डकैत हत्या, अपहरण, फिरौती, बलात्कार और आगजनी जैसे गंभीर अपराधों में लिप्त था। कई गांवों को उजाड़ देने वाले इस खूनखार डकैत की पुण्यतिथि मनाना न सिर्फ कानून की खिल्ली उड़ाना है, बल्कि पीड़ितों के ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है।

क्या राजनीति फिर से डकैतों के सहारे? बेटे को सहानुभूति में वोट?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि ददुआ की पुण्यतिथि महज़ एक श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक राजनीतिक गेम प्लान का हिस्सा है। बीते चुनाव में सपा के टिकट पर लड़ रहे वीर सिंह पटेल, जो ददुआ का बेटा है, को महज़ 1000 वोटों से हार मिली थी। जानकारों का मानना है कि ददुआ की ‘लोकप्रियता’ को कैश कराने की कोशिश फिर से हो रही है। क्या यह आयोजन भावनात्मक कार्ड खेलकर जनता की सहानुभूति बटोरने की साजिश है?

प्रशासन मौन क्यों? योगी राज में माफिया का अंत या पुनर्जन्म?
योगी आदित्यनाथ की सरकार जिस तरह गुंडा, माफिया, और अपराधियों पर कार्रवाई कर रही है, वह काबिल-ए-तारीफ है। लेकिन सवाल उठता है — क्या यही ‘डकैतों का अंत’ है? एक ओर माफिया ढेर हो रहे हैं, दूसरी ओर कुख्यात डकैतों की पुण्यतिथियां बड़े ठाठ से मनाई जा रही हैं। प्रशासन चुप है, और सवालों के घेरे में है — क्या यह आयोजन राजनीतिक संरक्षण में हो रहा है?

“डकैत की पूजा शर्मनाक” — जनता में गुस्सा, प्रशासन से जवाब की मांग
इलाके के कुछ सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इस आयोजन की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यदि अपराधियों को महिमामंडित किया जाएगा तो आने वाली पीढ़ी अपराध को रास्ता नहीं, आदर्श समझेगी। कई लोगों ने प्रशासन से पूछा है कि क्या अब हर कुख्यात अपराधी की जयंती-पुण्यतिथि ऐसे ही मनाई जाएगी? क्या अपराध अब समाज में नया ‘धर्म’ बन गया है?

2007 में एसटीएफ ने किया इनकाउंटर, अब राजनीति ने फिर से ज़िंदा किया ‘डकैत ददुआ’ को?
2007 में एसटीएफ ने जब पाठा के जंगलों में ददुआ को मार गिराया था, तो पूरा बुंदेलखंड राहत की सांस ली थी। लगा कि डकैतों का युग समाप्त हो गया। लेकिन अब 17 साल बाद, अचानक से हर साल उसकी पुण्यतिथि मनाई जाने लगी है! सवाल यह है कि जिस कुख्यात अपराधी की बरसी कभी नहीं मनी, अब अचानक उसका “संत” जैसा महिमामंडन क्यों? क्या यह सब सियासी खेल है? क्या योगी सरकार में अपराधियों की विरासत को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है?

17 साल तक चुप्पी, अब क्यों श्रद्धांजलि? राजनीति की चाल या भावनात्मक कार्ड?
2007 से लेकर 2022 तक ददुआ का नाम सिर्फ इतिहास और पुलिस फाइलों में ही रहा। कभी कोई भंडारा, कभी कोई श्रद्धांजलि सभा नहीं हुई। लेकिन बीते दो वर्षों से दतिया आश्रम में बड़े स्तर पर पुण्यतिथि और भंडारे का आयोजन किया जा रहा है। इसमें न सिर्फ ददुआ को श्रद्धा के फूल चढ़ाए जा रहे हैं, बल्कि राजनीतिक चेहरों की चुपचाप मौजूदगी भी देखी गई है। क्या यह महज इत्तेफाक है, या आने वाले चुनावों की तैयारी का।

डकैत जीवन में भी राजनीति में दखल, क्या अब मौत के बाद भी वोट दिलाएगा?
ददुआ की पकड़ सिर्फ जंगलों तक नहीं थी, बल्कि वह क्षेत्र की राजनीति को भी नियंत्रित करता था। किसे विधायक बनाना है, किसे नहीं—ये तय करने की ताकत उसके पास मानी जाती थी। जानकार कहते हैं कि ददुआ ज़िंदा था तो डर के दम पर राजनीति करता था, अब मरा हुआ है तो भावनाओं के दम पर राजनीति करवाई जा रही है। क्या उसकी पुण्यतिथि के आयोजन से बेटे को चुनावी फायदा दिलवाने की कोशिश की जा रही है?

योगी राज में अपराधियों की विरासत का गुणगान? प्रशासन की चुप्पी क्या संकेत दे रही है?
योगी सरकार ने प्रदेश में गुंडों और माफियाओं पर बुलडोज़र चलाकर साफ संदेश दिया था — “अब कानून का राज होगा।” लेकिन ददुआ जैसे खूंखार डकैत की पुण्यतिथि पर भंडारे और धार्मिक आयोजन प्रशासन की निगरानी में या मिलीभगत से हो रहे हैं, तो ये सवाल उठना लाज़मी है: क्या अब अपराध की विरासत को भी महिमामंडित किया जाएगा?

जनता का सवाल: क्या अब हर अपराधी की पुण्यतिथि पर प्रसाद बंटेगा?
इलाके में लोगों का गुस्सा फूटने लगा है। कई सामाजिक संगठनों और पूर्व पुलिस अधिकारियों ने खुले तौर पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जिसने खून बहाया, गांव जलाए, महिलाओं पर अत्याचार किया — अब वही “पूज्य” बन जाए, तो समाज किस दिशा में जाएगा? सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गरमा रहा है, जहां लोग पूछ रहे हैं: “क्या अब अपराध को भी परंपरा बना दिया जाएगा?”

ददुआ का मारा जाना एक युग का अंत था, लेकिन अब उसकी पुण्यतिथि का आयोजन एक नए संकट का आगाज़ है। ये सिर्फ एक व्यक्ति की बरसी नहीं, बल्कि पूरे समाज, प्रशासन और लोकतंत्र के लिए एक आइना है — जिसमें डर, राजनीति और चुप्पी तीनों नज़र आते हैं।

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