सहारा सिटी में बगावत! कर्मचारियों ने सातों गेट वेल्ड कर किए सील, बिजली-पानी काटा
बकाया वेतन और बंद सैलरी के खिलाफ फूटा गुस्सा, कर्मचारियों ने कहा — नहीं खुलेंगे गेट जब तक नहीं मिले समाधान

जन एक्सप्रेस लखनऊ।सहारा समूह के खिलाफ उसके ही कर्मचारियों का गुस्सा अब सड़कों से उठकर सहारा सिटी की दीवारों से टकरा गया है। लखनऊ स्थित सहारा सिटी परिसर को कर्मचारियों ने पूरी तरह सील कर दिया है। सातों गेटों पर ताले जड़ दिए गए हैं, और गेट्स को वेल्डिंग करके स्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। इतना ही नहीं, बिजली और पानी की सप्लाई भी पूरी तरह काट दी गई है, जिससे कॉलोनी अंधेरे में डूब गई।
क्यों भड़के कर्मचारी?
कर्मचारियों का कहना है कि: ,वेतन महीनों से बकाया है ,प्रबंधन लगातार चुप्पी साधे बैठा है ,किसी भी मांग पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल रही है इसी के चलते कर्मचारी अब आर-पार के मूड में हैं और उन्होंने स्पष्ट कह दिया है कि, जब तक ठोस आश्वासन नहीं मिलेगा, कोई गेट नहीं खुलेगा।”
धरना स्थल बना सहारा सिटी का मुख्य गेट
हजारों कर्मचारी अब धरने पर बैठ गए हैं, और किसी भी व्यक्ति को अंदर-बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जा रही। विरोध इतना मजबूत है कि रात के समय भी कर्मचारी जनरेटर से बिजली जलाकर प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।
प्रबंधन की ‘मौन नीति’ और कर्मचारियों का आरोप
कर्मचारियों का कहना है कि जैसे ही प्रबंधन को धरने की भनक लगी, सुब्रत रॉय के करीबी रिश्तेदारों को पिछले गेट से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। यह दर्शाता है कि प्रबंधन केवल अपनों की चिंता कर रहा है, जबकि वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को नजरअंदाज
किया जा रहा है।
प्रमुख मांगें:
सभी कर्मचारियों को बकाया वेतन का तत्काल भुगतान
समस्याओं का स्थायी और स्पष्ट समाधान
पुलिस पहुंची, लेकिन नहीं मिला हल
धरने की सूचना मिलने पर पुलिस टीम मौके पर पहुंची। हालांकि, वहां कर्मचारियों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। कर्मचारियों ने दो टूक कहा —हम न हटेंगे, न हटने देंगे — जब तक समाधान नहीं।”
सहारा समूह की साख को बड़ा झटका
यह विरोध प्रदर्शन सहारा समूह की मौजूदा वित्तीय हालात और प्रबंधन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
हजारों परिवारों का भविष्य अधर में ,समूह की प्रतिष्ठा को गहरी चोट ,संकट और असंतोष अब खुले प्रदर्शन में तब्दील सिर्फ विरोध नहीं, कर्मचारी क्रांति है सहारा सिटी के दरवाजे अब सिर्फ ताले नहीं, एक चेतावनी से बंद हैं —जब तक श्रमिकों की मेहनत का हक नहीं मिलेगा, तब तक शांति नहीं होगी।






