
जन एक्सप्रेस/नैनीताल(उत्तराखण्ड) : भारत में वन्यजीव संरक्षण की नींव रखने वाले प्रसिद्ध पर्यावरणविद् जिम कॉर्बेट की ऐतिहासिक बंदूक बीते छह वर्षों से कालाढूंगी थाने में ‘कैद’ है। यह वही बंदूक है जो कभी जिम कॉर्बेट ने अपने सहयोगी शेर सिंह को जंगली जानवरों से गांव की रक्षा के लिए दी थी। लेकिन अब यह धरोहर न पर्यटकों को दिख रही है, न म्यूजियम की शोभा बन पा रही है।
मूलतः ब्रिटिश मूल के लेकिन भारत में जन्मे जिम कॉर्बेट का वन्यजीवन और संरक्षण में अमूल्य योगदान रहा है। उनके द्वारा बसाए गए गांव छोटी हल्द्वानी में स्थित म्यूजियम में देश-विदेश से आने वाले पर्यटक उनकी विरासत को देखने आते हैं। लेकिन ऐतिहासिक महत्व रखने वाली उनकी बंदूक, जो कभी म्यूजियम की सबसे खास वस्तु मानी जाती थी, अब म्यूजियम में मौजूद नहीं है।
लाइसेंस ट्रांसफर बना अड़चन
छह साल पहले बंदूक के अंतिम धारक त्रिलोक सिंह नेगी की मृत्यु के बाद इसका लाइसेंस उनके बेटे मोहित नेगी के नाम ट्रांसफर होना था। लेकिन फाइलें नैनीताल कलक्ट्रेट के सशस्त्र विभाग में धूल फांक रही हैं। लाइसेंस न बनने के चलते बंदूक को थाने में जमा करा दिया गया, जहां से अब तक यह बाहर नहीं आ सकी।
बंदूक का गौरवशाली इतिहास
1915 में जिम कॉर्बेट ने छोटी हल्द्वानी में गांव बसाया और जंगली जानवरों से फसलों की रक्षा के लिए चारों ओर पत्थरों की दीवार बनाई। जब दीवार पार कर जानवर गांव में घुसने लगे, तो उन्होंने शेर सिंह को यह बंदूक सौंपी। यही बंदूक बाद में त्रिलोक सिंह नेगी के पास आई और अब मोहित नेगी तक पहुंचने की राह देख रही है।
पर्यटक हो रहे निराश
कॉर्बेट म्यूजियम में आने वाले सैकड़ों पर्यटकों को यह बंदूक कभी म्यूजियम की शान के रूप में दिखाई जाती थी। नेचर गाइड इंद्र बिष्ट बताते हैं कि कॉर्बेट की किताबों में भी इस बंदूक का उल्लेख है। लेकिन अब पर्यटक सिर्फ तस्वीरें देखकर लौट रहे हैं।
जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल
स्थानीय लोगों और गाइडों का कहना है कि जब यह बंदूक संरक्षण की कहानी का अभिन्न हिस्सा है, तो इसकी वापसी और प्रदर्शन की दिशा में प्रशासन गंभीर क्यों नहीं है?
कॉर्बेट की विरासत अधूरी क्यों?
यह सवाल आज हर उस पर्यटक के मन में उठता है जो कॉर्बेट के आदर्शों से जुड़ने के लिए म्यूजियम आता है।






