उत्तर प्रदेशलखनऊ

जूता एक प्रतीक बन गया: भारतीय न्याय व्यवस्था पर टूटता विश्वास और जनता का आक्रोश

राकेश किशोर का सांकेतिक विरोध या टूटे हुए भारत की सच्ची तस्वीर? जब न्याय नहीं मिलता, तो जनता कब तक चुप बैठे?

जन एक्सप्रेस /नई दिल्ली /लखनऊ। देश की सर्वोच्च अदालत के सामने एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन ने पूरे भारत को झकझोर दिया है। राकेश किशोर नामक व्यक्ति द्वारा सुप्रीम कोर्ट की ओर सांकेतिक जूता फेंके जाने की घटना मात्र एक आवेश नहीं, बल्कि उस गहरे असंतोष का प्रतीक बन गई है, जो आज भारत की आम जनता के दिलों में न्याय व्यवस्था को लेकर पनप रहा है।राकेश किशोर का कहना है कि यह जूता किसी एक व्यक्ति या संस्था पर नहीं, बल्कि उस सम्पूर्ण तंत्र पर है जिसने भारत की जनता की न्याय की उम्मीदों को तोड़ दिया है — राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद और खासकर न्यायपालिका।यह सिर्फ कोर्ट पर नहीं है, यह पूरे तंत्र पर है। न्याय नहीं मिलेगा तो जनता क्या करे?” — राकेश किशोर

न्याय की प्रतीक्षा: तारीख पर तारीख, पीढ़ियों की बर्बादी

भारत में 5 करोड़ से अधिक केस लंबित हैं। कई मामलों में एक दादा केस दर्ज कराता है, पोता लड़ता है और पड़पोता भी न्याय की प्रतीक्षा में मर जाता है। आम आदमी के लिए न्याय अब एक सपने जैसा बन गया है। “तारीख पर तारीख” सिर्फ एक संवाद नहीं, अब एक राष्ट्रीय पीड़ा बन चुकी है।

बड़े मामलों पर मौन, आम जनता पर सख्ती?

किशोर ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ मामलों में “चुप्पी” और “संवेदनशीलता की कमी” की भी आलोचना की। उनका कहना है:हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जा वर्षों से बना हुआ है, और कोर्ट का स्टे आज भी लागू है।नूपुर शर्मा के मामले में कोर्ट की टिप्पणी चर्चा में रही, लेकिन कई मामलों में कोर्ट की निष्क्रियता चिंता का विषय बनी है।एक हाईकोर्ट जज के घर से 20 करोड़ की बरामदगी पर भी न्यायपालिका की चुप्पी सवाल खड़े करती है।

“माय लॉर्ड” के आगे कांपती व्यवस्था, लेकिन निर्णय नहीं आते

एक ओर डीएम, एसपी, सचिव तक जज के सामने झुक जाते हैं, लेकिन आम नागरिक को न्याय के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ता है। जनता पूछ रही है — क्या हमारी न्यायपालिका अकुशल, कामचोर या भ्रष्ट हो चुकी है?

भारत की जनता की गुहार: ‘न्याय दो, न्याय दो’

यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, यह देश की आत्मा की चीख है। भारत के बच्चे-बच्चे ने कोर्ट को अब तक अंतिम आसरा माना है, लेकिन अब उस विश्वास में दरार आ गई है। यह घटना चेतावनी है — अगर न्यायपालिका ने अपनी साख और गति नहीं सुधारी, तो लोकतंत्र की बुनियादें कमजोर हो सकती हैं। राकेश किशोर द्वारा उठाया गया यह कदम कानून की दृष्टि में गलत हो सकता है, लेकिन उनके पीछे छुपा दर्द अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह घटना पूरे सिस्टम के लिए एक चेतावनी है — न्याय का गला घोंटोगे, तो कभी न कभी जनता की चुप्पी भी टूटेगी।

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