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जम्मू-कश्मीर के मेडिकल स्टूडेंट्स में दाढ़ी काटने का आदेश पर मचा बवाल…

तमिलनाडु: तमिलनाडु में जम्मू-कश्मीर के मेडिकल स्टूडेंट्स को दाढ़ी काटने का निर्देश देने को लेकर विवाद खड़ा हो गया. हालांकि, इससे पहले कि ये मामला तूल पकड़ता स्वास्थ्य मंत्री मा. सुब्रमण्यम सामने आए और उन्होंने इस मामले पर सफाई दी. स्वास्थ्य मंत्री ने बुधवार (6 मार्च) को कहा कि जम्मू-कश्मीर के छात्रों ने मेडिकल कॉलेज के जरिए दाढ़ी को लेकर जो सामान्य निर्देश जारी किए गए थे, उन्हें गलत समझ बैठा, जिसकी वजह से परेशानी खड़ी हुई.

द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के छात्र तमिलनाडु के सरकारी चेंगलपट्टू मेडिकल कॉलेज के तहत आने वाले नर्सिंग कॉलेज में पढ़ते हैं. हाल ही में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल की तरफ से एग्जाम के दौरान सभी छात्रों को क्लीन शेव होकर आने के लिए सामान्य निर्देश जारी किया गया. हालांकि, जैसे ही ये निर्देश सामने आया, इसे लेकर विवाद खड़ा हो गया. जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने तुरंत इस पर आपत्ति जताई.

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का उठा मामला

जम्मू-कश्मीर स्टूडेंट्स एसोसिएशन ने अपनी शिकायत को सोशल मीडिया पर एक याचिका के जरिए शेयर किया. एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की. एसोसिएशन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के लगभग दो दर्जन छात्रों को अपनी दाढ़ी काटने के लिए मजबूर किया गया है. इस कार्रवाई ने न केवल इन छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया है, बल्कि समाज में समावेशिता और विविधता के सम्मान पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं.

मेडिकल कॉलेजों को मिला ये निर्देश

मीडिया को संबोधित करते हुए तमिलनाडु स्वास्थ्य मंत्री सुब्रमण्यम ने कहा, मामले को सुलझा लिया गया और स्टूडेंट्स ने बाद में मुख्यमंत्री को शुक्रिया भी कहा है. उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पोस्ट के तुरंत बाद, स्वास्थ्य सचिव गगनदीप सिंह बेदी ने प्रिंसिपल से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि ये सभी छात्रों के लिए जारी एक सामान्य निर्देश था. सुब्रमण्यम ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों को ऐसे निर्देश जारी करते समय सतर्क रहने को कहा गया है ताकि उन्हें गलत न समझा जाए.

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, ‘देश के विभिन्न हिस्सों से स्टूडेंट्स यहां पर ऑल इंडिया कोटा सीटों के तहत पढ़ाई करने के लिए आते हैं. इसलिए किसी को भी उनके खान-पान, पहनावे, संस्कृति, परंपरा और उनके धर्म में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.’

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