
जन एक्सप्रेस/उत्तरकाशी: हमारे पुराणों में गंगा का स्वरूप केवल एक भौगोलिक नदी के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि, जीवन और चेतना की आधारधारा के रूप में वर्णित किया गया है। पौराणिक संदर्भों में गंगा की उत्पत्ति, स्वरूप और महत्व को अत्यंत गूढ़ एवं दार्शनिक दृष्टि से स्पष्ट किया गया है, जो आधुनिक पर्यावरणीय सोच के साथ भी गहरा सामंजस्य स्थापित करता है।
पद्म पुराण के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा द्वारा प्रकृति को सृजन का आधार माना गया और उसी दिव्य तत्व से गंगा का प्रादुर्भाव हुआ। भगवान विष्णु के चरणों से प्रवाहित होकर यह धारा ब्रह्मा के कमंडल में संचित हुई और तत्पश्चात भगवान शिव की जटाओं में स्थिर होकर नियंत्रित रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुई। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया प्राकृतिक शक्तियों के संतुलन, ऊर्जा के नियंत्रण और जल प्रवाह की वैज्ञानिक समझ को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करती है।
राजा भगीरथ की तपस्या द्वारा गंगा का पृथ्वी पर आगमन मानव संकल्प, धैर्य और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश देता है। गंगा का त्रिपथगा स्वरूप स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों में प्रवाह जलचक्र की व्यापकता और जीवन के विभिन्न स्तरों में जल की अनिवार्यता को दर्शाता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण में गंगा को श्रीकृष्ण और राधा से संबद्ध एक दिव्य चेतना के रूप में भी वर्णित किया गया है, जहाँ गंगा केवल जलधारा नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक बन जाती है। यह दृष्टिकोण हमें यह समझने में सहायता करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवंत और संवेदनशील सत्ता के रूप में देखा गया है।
इन ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि गंगा का स्पर्श और सेवन मनुष्य को केवल धार्मिक पुण्य ही नहीं, बल्कि मानसिक शुद्धता और जीवन में संतुलन प्रदान करता है। यह तथ्य आधुनिक विज्ञान में जल की गुणवत्ता, उसके जैविक गुणों और मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव से भी मेल खाता है।
वर्तमान समय में जब नदियाँ प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध दोहन के संकट से गुजर रही हैं, तब पुराणों में वर्णित गंगा का स्वरूप हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की प्रेरणा देता है। इस संदर्भ में डॉ शम्भू प्रसाद नौटियाल, संयोजक गंगा विश्व धरोहर मंच ने कहा कि पुराणों में गंगा का वर्णन केवल आस्था का विषय ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का शाश्वत संदेश है। गंगा हमें सिखाती है कि जीवन का आधार जल है और उसका संरक्षण ही मानव अस्तित्व की सुरक्षा है। यदि हम गंगा को समझेंगे, तो हम प्रकृति के साथ संतुलन बनाना भी सीखेंगे। उन्होंने आगे कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पौराणिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर जल संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को जनआंदोलन का रूप दें। समाज के सभी वर्गों से आह्वान है कि वे गंगा को केवल श्रद्धा से नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से भी देखें और इसके संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाएं।






