Monday, October 3, 2022
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जानें जीवित्पुत्रिका व्रत का शुभ मुहूर्त

अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत किया जाता है। इसे कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जैसे जितिया या जिउतिया। यह बहुत कठिन व्रतों में से एक व्रत है। यह व्रत मांएं अपनी संतान के खुशहाल जीवन और समृद्धि के लिए रखती हैं। साथ ही मां अपनी संतान के लिए लिए कामना करती है कि वह दीर्घायु, आरोग्य और सुखमय जीवन जी सके। जहां तक इस व्रत के नियमों की बात है, यह पूरे तीन दिन तक चलते हैं। यह नहाय खाय से शुरू होते हुए व्रत और पारण के बाद यह व्रत संपन्न होता है। इस व्रत के दौरान जीमूतवाहन भगवान की पूजा प्रदोष काल में की जाती है। इस साल यह व्रत 18 सितंबर 2022, रविवार को किया जाएगा। लेकिन जो भी महिला इस व्रत को कर रही है, उसे बहुत ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए। इस व्रत के दौरान किसी तरह की गलती की गुंजाइश नहीं रहनी चाहिए। ऐसा होने पर व्रत असफल हो जाता है और इसके सकाराकत्मक फल प्राप्त नहीं होते हैं। यहां हम जानेंगे कि इस बार आप किस मुहूर्त में यह पूजा करें और साथ ही किस तरह की सावधानियां बरतें।

मुहूर्त

यह व्रत रखने के लिए महिलाओं को 24 घंटे का निर्जला उपवास रखना होता है। अक्सर देखा जाता है कि ज्यादातर महिलाएं शुभ मुहूर्त को लेकर भ्रमित रहती हैं और किसी भी समय भगवान की पूजा कर बैठती हैं। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। इस साल जीवित्पुत्रिका व्रत 18 सितंबर, 2022 को होगा। ऋषिकेश पंचांग की मानें तो अष्टमी तिथि 17 सितंबर को अपराह्न 2:56 बजे से यह आरंभ होगा और 18 सितंबर शाम 4:39 बजे तक समाप्त होगा।

जीवित्पुत्रिका व्रत के दिन महिलाओं को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि कामों से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान के सामने हाथ जोड़कर पूजा करनी चाहिए। फिर पूरे दिन का निर्जला व्रत करना चाहिए। व्रत के अगले दिन पारण किया जाता है और सूर्य को अर्घ्य देने के बाद भोजन ग्रहण करना होता है। आपको बताते चलें कि अष्टमी को प्रदोष काल में महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। इस दौरान गाय के गोबर की मदद से पूजा के स्थान पर एक छोटा सा तालाब बनाया जाता है। इसके बाद जीमूतवाहन की प्रतिमा जल में स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है। पूजा के दौरान धूप, अक्षत, फूल चढ़ाया जाता है और माला भी अर्पित की जाती है। फिर भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना कर जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी जाती है।

इन बातों का रखें ध्यान

– व्रत से एक दिन पहले नहाय-खाय किया जाता है। फिर पूजा करने के बाद भोजन ग्रहण किया जाता है।

– अगले दिन निर्जला व्रत रखा जाता है।

– व्रत यदि शुरू कर दिया जाए, तो इसे हर साल करना होता है। व्रत को बीच में नहीं छोड़ा जाता।

– व्रत रखने के दौरान ब्रह्माचार्य का पालन किया जाता है।

– मन में साफ-शुद्ध विचार रखने चाहिए और किसी के साथ मतभेद आदि से बचना चाहिए।

– जितिया व्रत के नियम पूरे तीन दिनों के लिए होते हैं। पहले दिन नहाय-खाय और दूसरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है।

– तीसरे दिन सुबह उठकर स्नानादि के बाद पूजा-पाठ करने करके व्रत का पारण किया जाता है।

 

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