शांतिकुंज में शिक्षकों का संकल्प: बच्चों को किताबों के साथ संस्कार भी देंगे
शांतिकुंज में शिक्षकों का संकल्प

जन एक्सप्रेस हरिद्वार
हरिद्वार, 31 मई। गायत्री तीर्थ शांतिकुंज में आयोजित दो दिवसीय शिक्षक गरिमा शिविर रविवार को प्रेरणादायक संदेशों के साथ संपन्न हो गया। शिविर का मुख्य संदेश रहा कि शिक्षा केवल अंकों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व, चरित्र और संस्कारों के निर्माण का माध्यम भी बननी चाहिए।
दो दिवसीय शिविर में छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों से आए शिक्षक, शिक्षिकाएं और संस्कृति ज्ञान परीक्षा से जुड़े स्वयंसेवकों ने भाग लिया। शिविर के दौरान शिक्षा को जीवन मूल्यों से जोड़ने और बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनाने पर विशेष चर्चा हुई।
शिविर की अधिष्ठात्री श्रद्धेया शैलदी ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि समाज के चरित्र निर्माता हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों के भीतर नैतिकता, अनुशासन, संवेदनशीलता और देशभक्ति के संस्कार विकसित करने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
समापन सत्र में महिला मंडल की अध्यक्ष शैफाली पंड्या ने कहा कि स्कूल और परिवार समाज की सबसे मजबूत नींव हैं। पढ़ाई का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि बच्चों को अच्छा इंसान बनाना होना चाहिए। उन्होंने कहा कि असली शिक्षा वही है, जो बच्चे को दूसरों के प्रति संवेदनशील बनाए, समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव जगाए और देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा दे।
उन्होंने गायत्री परिवार की संस्थापिका माता भगवती देवी शर्मा का उदाहरण देते हुए कहा कि समाज निर्माण में महिलाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। परिवार, विद्यालय और समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए नारी शक्ति की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
शिविर में इन विषयों पर हुई चर्चा:
- संवेदनशीलता: बच्चों में अमीर-गरीब के भेदभाव से ऊपर उठकर सभी की मदद करने का भाव विकसित हो।
- सदाचार और अनुशासन: सच बोलना, समय की पाबंदी और बड़ों का सम्मान करना।
- कर्तव्यनिष्ठा: अपने कार्य को ईमानदारी और जिम्मेदारी से करना।
- सामाजिक जिम्मेदारी: स्वच्छता, पौधरोपण और जरूरतमंदों की सहायता के प्रति जागरूकता।
- राष्ट्र निर्माण: बच्चों में देशप्रेम और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित करना।
शिविर के दौरान शिक्षकों ने अपने अनुभव भी साझा किए और संकल्प लिया कि शिक्षा को और अधिक प्रभावी, मूल्यपरक और समाजोपयोगी बनाया जाएगा।
समापन अवसर पर उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। शिविर का संदेश साफ रहा कि यदि शिक्षक विद्यालय में संस्कारों की शिक्षा दें और अभिभावक घर में उन्हें आगे बढ़ाएं, तो आने वाली पीढ़ी स्वतः सही दिशा में आगे बढ़ेगी।






