
जन एक्सप्रेस/हरिद्वार(उत्तराखण्ड) : हरिद्वार नगर निगम भूमि घोटाले में निलंबित नगर आयुक्त वरुण चौधरी की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं। अब मनसा देवी रोपवे टेंडर मामले में उन पर नियमों को ताक पर रखकर शर्तों में मनमाने बदलाव करने के गंभीर आरोप लगे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, तत्कालीन नगर आयुक्त ने बिना नगर निगम बोर्ड की अनुमति के ही टेंडर की शर्तों में बदलाव कर दिया था, जिससे अनुभवहीन कंपनियों को भी इस संवेदनशील परियोजना में भाग लेने का मौका मिल गया।
बोर्ड गठन के बाद भी नहीं ली गई मंजूरी
जांच में खुलासा हुआ है कि 7 फरवरी 2025 को नगर निगम बोर्ड का गठन हो चुका था, लेकिन इसके बावजूद रोपवे टेंडर से जुड़ा कोई प्रस्ताव बोर्ड के समक्ष नहीं रखा गया। नियमानुसार इस तरह के महत्वपूर्ण निर्णय पर बोर्ड में चर्चा होना अनिवार्य था, लेकिन प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए केवल महापौर की स्वीकृति लेकर टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।
अनुभवहीन कंपनियों के टेंडर पर उठे सवाल
टेक्निकल बिड खुलने के बाद यह बात सामने आई कि सड़क और भवन निर्माण करने वाली कंपनियों ने भी टेंडर डाले हैं। ये कंपनियां रोपवे संचालन या अनुरक्षण का कोई अनुभव नहीं रखती थीं। सूत्रों के अनुसार, इनमें से कुछ फर्में हरियाणा के गुरुग्राम स्थित बिल्डर्स से जुड़ी हैं।
अनुभवी कंपनी ने खटखटाया अदालत का दरवाज़ा
मनसा देवी जैसे भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थल पर रोपवे संचालन एक अत्यंत तकनीकी कार्य है, जिसमें सुरक्षा सर्वोपरि है। ऐसे में जब रोपवे संचालन का वर्षों का अनुभव रखने वाली कंपनी ‘उषा ब्रेको’ को टेंडर प्रक्रिया में अनदेखा किया गया, तो कंपनी ने इस मामले को अदालत में चुनौती दी।
इस कदम के बाद नगर निगम ने आनन-फानन में टेंडर प्रक्रिया को स्वतः रद्द कर दिया।
अब अनिवार्य किया गया 5 वर्षों का अनुभव
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब रोपवे संचालन के लिए कम से कम पांच वर्षों का अनुभव अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि भविष्य में किसी भी अप्रशिक्षित कंपनी को ऐसा टेंडर न सौंपा जा सके।
हरिद्वार नगर निगम की कार्यशैली और पारदर्शिता पर पहले से ही सवाल खड़े हो रहे थे, लेकिन अब रोपवे टेंडर प्रकरण ने इन आशंकाओं को और पुख्ता कर दिया है। निलंबित आयुक्त वरुण चौधरी के खिलाफ जांच तेज होने की उम्मीद है, और यदि आरोप सही साबित हुए, तो यह मामला राज्य स्तर पर बड़ा प्रशासनिक संकट बन सकता है।






