
जन एक्सप्रेस/देहरादून(उत्तराखण्ड) : उत्तराखंड सरकार के एक हालिया आदेश ने राज्य के हजारों कर्मचारियों को असमंजस में डाल दिया है। आदेश के अनुसार, यदि कोई भी राज्य कर्मचारी 5000 रुपये से अधिक की कोई भी चल या अचल संपत्ति खरीदता है, तो उसे इसकी जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारी (प्राधिकारी) को देनी होगी। यह प्रावधान राज्य कर्मचारी आचरण नियमावली-2002 के नियम-22 में पहले से था, लेकिन इसे वर्षों से नजरअंदाज किया जा रहा था। अब मुख्य सचिव आनंदबर्द्धन द्वारा सभी विभागों को इसे कड़ाई से लागू करने के निर्देश दिए जाने के बाद इस नियम को लेकर विवाद गहराने लगा है।
क्या कहता है नियम 22?
आचरण नियमावली के मुताबिक,
- कोई भी कर्मचारी बिना पूर्व सूचना के 5000 रुपये से अधिक की संपत्ति नहीं खरीद सकता।
- यदि कोई कर्मचारी जमीन, मकान, वाहन, या दान में मिली संपत्ति को अर्जित करता है तो इसकी भी जानकारी देना अनिवार्य है।
- पालन न करने की स्थिति में इसे नियम उल्लंघन माना जाएगा।
कर्मचारी संगठन लामबंद
इस आदेश के विरोध में राज्य के विभिन्न कर्मचारी संगठन एकजुट हो गए हैं। पर्वतीय कर्मचारी-शिक्षक संगठन के पदाधिकारियों ने इसे अव्यावहारिक बताते हुए नियम-22 में संशोधन की मांग की है।
हरिद्वार जिलाध्यक्ष ललित मोहन जोशी ने कहा, “आज के दौर में 5000 रुपये की सीमा तर्कसंगत नहीं है। एक सामान्य मोबाइल, फ्रिज, वॉशिंग मशीन या स्कूटर के पार्ट्स भी इससे महंगे हैं। यह नियम व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर चोट है।”
संशोधन प्रस्ताव तैयार
कार्मिक एवं सतर्कता विभाग के सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस विवाद को गंभीरता से ले रही है। नियमावली में संशोधन कर 5000 रुपये की सीमा को बढ़ाकर 1 लाख रुपये करने का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है। यह प्रस्ताव जल्द ही कैबिनेट में रखा जाएगा।
जनमानस और कर्मचारियों की प्रतिक्रिया
आदेश के बाद से सोशल मीडिया पर भी बहस छिड़ गई है। कुछ लोगों ने इस नियम को ‘ज़रूरी पारदर्शिता’ बताया, तो अधिकतर ने इसे ‘जमाने से पीछे चला नियम’ करार दिया।





