ऑपरेशन महाकाल पर बड़ा सवाल, कोर्ट में बोले सुरेश पाल—अखिलेश दुबे ने नहीं मांगी रंगदारी

कानपुर से अमन तिवारी की रिपोर्ट
जन एक्सप्रेस / कानपुर: कानपुर नगर जिला एवं सत्र न्यायालय में विचाराधीन चर्चित सत्र वाद संख्या 1138/2026 (मु०अ०सं० 182/2025, थाना किदवई नगर) में अभियोजन पक्ष को बड़ा झटका लगा है। मामले के वादी व मुख्य गवाह (PW-1) होटल कारोबारी सुरेश पाल ने अदालत में बयान देते हुए तहरीर थाने में देने से साफ इनकार कर दिया। सुरेश पाल ने कहा कि न तो अखिलेश दुबे ने कभी उनसे रंगदारी मांगी और न ही कभी उन्हें धमकाया।
अदालत में प्रतिपरीक्षा के दौरान सुरेश पाल ने पुलिस व विशेष जांच दल (SIT) की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए। गवाह ने बयान दिया कि वर्ष 2022 के नौबस्ता थाने के एक पुराने पॉक्सो मामले (जिसमें पूर्व में फाइनल रिपोर्ट लग चुकी थी) को दोबारा खोलने और ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत जेल भेजने की धमकी देकर पुलिस अधिकारियों ने उनसे टाइपशुदा कागजों पर जबरन हस्ताक्षर करवाए थे। उन्होंने यह भी कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष दिया गया बयान भी पुलिस के भारी दबाव में दिया गया था।
बचाव पक्ष की प्रतिपरीक्षा के दौरान गवाह सुरेश पाल ने खुलासा किया कि अगस्त 2025 में वह गंभीर हृदय रोग के चलते एम्स, नई दिल्ली में भर्ती थे और 16 अगस्त को उनकी हार्ट सर्जरी प्रस्तावित थी। इसी दौरान कानपुर पुलिस द्वारा घर व होटल पर लगातार फोन कर दबाव बनाया गया, जिसके चलते उन्हें 6 अगस्त को इलाज अधूरा छोड़कर कानपुर लौटना पड़ा। इसके बाद 7 अगस्त को एसआईटी कार्यालय में दबाव बनाकर उनसे कागजातों पर दस्तखत कराए गए।
अभियोजन द्वारा लगाए गए इस आरोप पर कि गवाह ने आरोपियों को रंगदारी की रकम देने के लिए अपनी संपत्तियां बेची थीं, सुरेश पाल ने अदालत में इसे सिरे से खारिज कर दिया। पाल ने स्पष्ट किया कि उन्होंने प्रयागराज (इलाहाबाद) स्थित अपना आवासीय मकान करीब दो करोड़ रुपये में और वृंदावन का प्लॉट करीब डेढ़ करोड़ रुपये में अपनी व्यावसायिक जरूरतों के चलते बेचा था, न कि किसी आपात स्थिति अथवा रंगदारी चुकाने के लिए। उन्होंने यह भी कहा कि अभियुक्त लवी मिश्रा से भी उनका कभी कोई लेन-देन नहीं हुआ।
अब इस मामले में मुख्य गवाह सुरेश पाल के अदालत में दिए गए सनसनीखेज बयानों के बाद अब तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार की कार्यशैली और अधिवक्ता अखिलेश दुबे के प्रति उनके कथित पूर्वाग्रह पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। गौरतलब है कि तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार ने ही जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था। गवाह ने अदालत में साफ कहा है कि एसआईटी ने एम्स में चल रहे उनके इलाज के बीच उन्हें जबरन कानपुर बुलाया और एक पुराने मामले को खोलकर ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत जेल भेजने की धमकी देते हुए टाइपशुदा कागजों पर जबरन हस्ताक्षर कराए थे। चूंकि गवाह ने अदालत में शपथ लेकर यह स्वीकार कर लिया है कि अखिलेश दुबे ने उनसे कभी कोई रंगदारी नहीं मांगी थी, इसलिए अब यह आरोप लग रहे हैं कि अखिलेश दुबे के खिलाफ एसआईटी की यह पूरी कार्रवाई शायद किसी दुर्भावना और एकतरफा पूर्वाग्रह से प्रेरित थी। इस बड़े खुलासे ने कानपुर में पुलिस प्रशासन और ‘ऑपरेशन महाकाल’ के तहत की गई कार्रवाई की पारदर्शिता को पूरी तरह से कटघरे में लाकर खड़ा किया है।






